अपराधी को मृत्युदण्ड की माफी की राजनीति !
आधुनिक युग में मृत्यु दण्ड को उचित नहीं ठहराने के लिए बहुत चर्चा-परिचर्चा चलती रही है। ये सोच मानवाधिकार को लेकर कुछ ज्यादा चलती है। इस सबको करने से पहले शायद हम यह विचारना भूल जाते हैं कि जिसके प्रति अपराध हुआ क्या उसका कोई मानवाधिकार नहीं था ? आधुनिकता का ये कभी अभिप्राय नहीं होता की आप उन को दण्ड न दें जो मानवता का अपराधी है। जीने का अधिकार सबको है लेकिन उसका भी एक पैमाना तो होना ही चाहिए। राजनैतिक लाभ के लिए यदि कुछ ऐसी परम्पराओं को जन्म दे दिया जाता है, जिसकी हानि आखिर भविष्य में उठानी ही पड़ती है। इस तुच्छ व संकीर्ण मानसिकता के चलते जातिवाद का जहर पहले समाज जहर घोल रहा है। आज यदि अपराध बढ़ रहे हैं तो क्या उसके पीछे यही कारक कार्य नहीं कर रहा है ? आवश्यकता इस बात की है कि हम अपराध की प्रवृत्ति पर किस प्रकार से अंकुश लगा सकते हैं। एक ऐसे प्रधानमन्त्री जिसने सम्भवतः सर्वप्रथम भ्रष्टाचार के कारक को बताने का साहस किया उसके अपराधियों को एक राज्य सरकार द्वारा माफी दिए जाने की जो साजिश रची है उसका प्रबल व व्यापक विरोध होना ही चाहिए। ऐसे लोगों को बेनकाब कर सत्ता से पदच्युत कर देना चाहिए, अन्यथा एक ऐसी संकीर्ण मानसिकता का व्यापक प्रभाव सम्पूर्ण मानवता के लिए हानिप्रद होगा। इसके साथ ही दण्ड प्रक्रिया को लम्बित करना भी अपराध व अपराधियों को बढ़ते देने का एक कारक है। इस प्रकार के कार्यों के लिए निश्चित रूप से न्यायिक प्रणाली को दुरुस्त करने की महती आवश्यकता है, तभी हम राजनैतिकों के द्वारा किये जाने वाले पक्षपात से बच सकेंगे।
गुरुकुल कुरुक्षेत्र
हरियाणा