बुधवार, 30 नवंबर 2011

बाबा साहेब अम्बेडकर के विचार



आर्य के बारे में बाबा साहेब अम्बेडकर के विचार 



प्रश्न: क्या आप मानते हैं कि  शुद्र  गैर आर्य थे?

डॉ. अम्बेडकर:  नहीं, गहरे अध्ययन के बाद, मैं इस निष्कर्ष में पंहुचा  हु कि 
१.  शुद्र  भी  आर्यों थे, 
२. शुद्र  क्षत्रिय वर्ग के थे  और 
३.   शुद्र  पहले क्षत्रियों का एक वर्ग महत्वपूर्ण से थे और प्राचीन आर्य समुदाय के सबसे प्रतिष्ठित और शक्तिशाली राजा थे. 
क्यू: मैं जानता हूँ कि  आप  पश्चिमी लेखकों के विभिन्न सिद्धांतों से   अच्छी तरह परिचित है  जिसमे वे  char  वर्ण को  गैर आर्यों  के रूप में वर्णन  करते  हैं. आप किसी भी  बिंदु  पर सहमत है, जिससे आपके  सिधांत  और   पश्चिमी लेखकों सिध्हंतो में किसी भी विचार में एकता बन सके. 
डॉ. अम्बेडकर : मै  निम्नलिखित पश्चिमी   सिध्धांतो से सहमत  नहीं   हु: 

1) जो लोग वैदिक साहित्य बनाया आर्य जाति के थे.
2) इस आर्यन नस्ल  भारत के बाहर से आया है और भारत पर आक्रमण किया.
3) भारत के मूल निवासी Dasas और Dasyus जो नस्ली आर्यों से अलग थे के रूप में जाने जाते थे.
4) आर्यों को एक सफेद नस्ल के  थे. Dasas और Dasyus एक काले  नस्ल के  थे.
5) आर्यों ने  Dasas और दस्युस पर  विजय प्राप्त की.
6) Dasas और Dasyus से विजय के बाद उनके  शुद्र  (गुलाम ) बनाया 
7) आर्यों पूर्वाग्रह  से ग्रसित थे  इसलिए वर्ण ब्यस्था  बनायीं  जिससे वे Dasas और Dasyus से अलग हो.और हमेश गुलाम रहे. 


प्रश्न:  इन पश्चिमी सिद्धांतों के आधार  क्या है?

उत्तर : इस सिद्धांतो का  नींव इसमें टिकी हुए है कि आर्य एक जाती है जो यहाँ रहती है.  

प्रश्न यह प्रस्ताव सही है? 
उत्तर : वेदों में कही भी आर्य को एक नस्ल या जाति के रूप में नहीं मिलता है.  एक नस्ल या जाति के कुछ रूप कुछ विशिष्ट लक्षण है जो वंशानुगत रखने के एक शरीर के रूप में परिभाषित किया जा सकता है.
वैदिक साहित्य  के परिशिक्षण  से पता चलता है कि ऋग्वेद  में आर्य शब्द का दो तरह से लिखा गया है, प्रथम  एक लंबे A के साथ  आर्य और द्वितीय   एक छोटी A के साथ आर्य  होते है.
 ऋग्वेद  में एक छोटी A शब्द का आर्य  88 स्थानों में प्रयोग किया गया  है. उअर शब्द के चार अलग अलग प्रकार से प्रयोग किया गया  है, 

(1) दुश्मन के रूप में, (2) सम्मानजनक व्यक्ति (3) भारत देश का  नाम और (4) मालिक वैश्य, या नागरिक. 
ऋग्वेद  में एक लब्बा  A शब्द का आर्य  31स्थानों में प्रयोग किया गया  है. लेकिन इनमें से कोई भी जाति या नस्ल  के अर्थ के रूप में प्रयोग नहीं किया गया है.  
वेदों से एक निर्विवाद निष्कर्ष  निकालता है , जो इस प्रकार है कि आर्य और आर्य शब्द जो वेदों में है इसका कही भी  नस्लीय भावना  में प्रयोग  नहीं किया गया है. 
अब  प्रो मैक्स म्यूएलर क्या इस विषय पर कहते हैं: 
रक्त  से कोई भी आर्यन नस्ल  या जाति नहीं  है. वैज्ञानिक भाषा में आर्यन पूरी तरह से एक विचार है , जो आर्यन को पूरी तरह एक नस्ल या जाति से इनकार करता है. 
आर्यन नस्ल  थ्योरी बिलकुल  बेतुका और मृतप्राय है. और पहले ही अमान्य कर देना चाहिए था. 


प्रश्न : कहाँ से तथाकथित आर्यन नस्ल  भारत में आया था? आर्यन नस्ल का  मूल घर कहा  था? क्या आर्य भारत में आक्रमण किये थे ? 
uttar: वैदिक साहित्य  के परिशिक्षण  से पता चलता कि आर्यों का भारत में  किसी भी आक्रमण  कोई सबूत नहीं है. और न ही ये पता चलता है कि  द्रविड़ , दस, नाग भारत के मूल निवासी है.  और इनसे अर्यो ने  विजय प्राप्त कि है. वेदों में कही भी ये  सबूत नहीं मिलता कि आर्यों, द्रविड़, नाग, दस के बिच कोई  नस्लीय भेद था है. और नहीं कही ये मिलता है कि आर्यों और  Dasas और Dasyus से रंग में अलग थे. वेदों के अनुसार सभी भारत के मूल निवासी थे. और रंगों से कोई अलग नहीं थे.  
पश्शिम सिध्धांत कहता है कि आर्य   गोरे थे जबकि वैदिक साहित्य के अनुसार ये सिद्ध नहीं होता है  उद्धरण के लिए, राम, कृष्ण, Dirghatamas, कण्व आदि रंग में काले  के रूप में वर्णित किया गया है. 

दावा है करते है कि आर्य बाहर से आए और अर्यो ने भारत पर आक्रमण किया इसका आधारसाबित करते है  है कि Dasas और Dasyus भारत के आदिवासी जनजातियों हैं पूरी तरह से झूठी और बेबुनियाद है.  
''आक्रमण का  सिद्धांत'' एक मनगढ़ंत कहानी है. 
आक्रमण के सिद्धांत एक  काल्पनिक धरना है.  कि आर्य नस्ल का मूल   शुद्धतम  प्रतिनिधि   Indo-Germanic people रहे हैं  जो वर्तमान में भी शुद्ध वजह से आवश्यक है मानते है . यह  सिद्धांत ऐसी मान्यताओं पर आधारित जो baseless है जो कि कल्पना और inferences पर आधारित है. सिद्धांत वैज्ञानिक जांच की एक विकृति है.जो कि बाहार  के तथ्यों का  अनुमति नहीं  देता है. यह सिद्धांत पूर्वाग्रह से ग्रसित  है जो तध्य लिया गया वह भारत के बहार से लिया जो कि अमान्य है.   पश्चिमी सिद्धांत भारत के सबसे पुराने ग्रन्थ ऋग्वेद को नहीं मानता है जोकि हमारे लिए   सबसे बड़ा  और अच्छा सबूत है. जो सिद्धांत हमारे वेदों से भिन्न है वह सब अमान्य है. और उसे हमें अस्वीकार किया जाना चाहिए. इसलिए विदेशो द्वारा  मानी गई ''आक्रमण का  सिद्धांत'' झूटी है. 

क्यू: क्या कोई हिन्दू  विद्वानों ने इस पश्चिमी सिद्धांत का समर्थन करते है ? 
एक: हा इस पश्चिमी सिद्धांत के कुछ ब्राह्मण विद्वानों से समर्थन प्राप्त हुआ है. यह एक बहुत ही अजीब घटना है.  हिंदुओं   ही अपने आप को  वे आमतौर पर एशियाई दौड़ से अधिक यूरोपीय दौड़ की श्रेष्ठता के अपने व्यक्त  आप ब्यक्त करके स्वीकार  कर रहे है. और हमारे  ''आर्य सिद्धांत '' को खुद ही  एक नापसंद कर रहे , ब्राह्मण अपने लोगो से नफरत कर रहे है. जैसे ये गुलाम है. और अपने आप को आर्य बाकि  हिन्दुयो को दास मानने लगे. और  पश्चिम सिध्धांत को मनाने लगे  है.  जैसे अपने आप कोई एक नस्ल के रूप में प्रदर्शित  कर रहे है. लेकिन वह सबसे स्वेच्छा से यह निवासी है. यह हम्मारी वैदिक सिध्धांत के अनुसार गलत है. भारत के हर जाति और  नस्ल  के लोग पहले आर्य थे और अभी भी एक है. 
क्यू: लोकमान्य तिलक के सुझाव के बारे में अपनी राय है कि आर्यन दौड़ के मूल घर आर्कटिक क्षेत्र में था,  क्या यह सत्य है? 

उत्तर : नहीं , ये गलत है . हमारे मूल वैदिक ग्रंथो एक बिदु अधिक देखा गया है कि  घोड़े वैदिक आर्यों की एक पसंदीदा जानवर था. जो कि आर्यों का सबसे उपयोगी और धार्मिक रूप से भी  साथ जुड़ा था. सवाल यह है: आर्कटिक क्षेत्र में क्या पाया घोड़ा था? अगर जवाब नकारात्मक है, आर्कटिक होम सिद्धांत बहुत अनिश्चित हो जाता है, 
अब तक  वैदिक साहित्य से अनुसार , यह सिद्धांत है कि आर्यों का मूल भारत से बाहर था अदि आर्य बाहर से थे तो फिर कभी कोई विदेशी मेरा गंगा, मेरे यमुना, मेरी सरस्वती, जैसे परिचित और प्यारी शब्दों का प्रयोग क्यों करेगा.  सात नदियों के  संदर्भ ऋग्वेद (75.5 एक्स) में बारबार प्रयोग किया गया है. जिससे अपने देशप्रेम कि भावना उत्त्पन होती  है. और कोई विदेशी ऐसा शब्दों का प्रयोग नहीं कर सकता है. 
रिग वेद से इस तरह के विचार ये  जाहिर है होता है. Dasas और Dasyus की गैर आर्यन नस्ल  का  आर्यन नस्ल  के साथ  एक सैन्य विजय के एक सिद्धांत सिद्ध नहीं होता है. 
 श्री पी.टी. श्रीनिवास आयंगर के अनुसार :  
सावधानी  पूर्वक   वैदिक मंत्रो का निरिक्षण  करने और जहा पर  आर्य, Dasas और Dasyus शब्दों का प्रयोग हुआ उससे पता चलता है  इन मंत्रो में कही भी   किसी नस्ल या पंथ कि तरफ इंगित  नहीं करता  है. ये शब्द ऋग्वेद संहिता पूरे पर १,५३,९७२ शब्दों वाले मंत्र में 33 बार आर्य शब्द का प्रयोग हुआ है.  यह दुर्लभ घटना अपने आप में एक सबूत है कि जनजाति   खुद Aryas कहा है.  जो खुद ही अपने देश में अकर्मण कैसे कर सकते है. 

चौथा वर्ना 
प्रश्न: यदि यूरोपीय विद्वानों के सिद्धांत गलत  हैं, तो फिर एक चौथा पीड़ित वर्ना के उद्भव कैसे हुए? 
उत्तर : पूरी स्थिति को संक्षेप में कहा जा सकता है जो कि  निम्नानुसार है: 
1) जो आज Shudras है वे  सुरु से  आर्य समुदाय के थे. 
2) आज के Shudras इंडो - आर्यन समाज में क्षत्रिय वर्ना के रूप में स्थान पर रहीं. 
3) एक बार जब आर्यन सोसायटी केवल तीन वर्णों, अर्थात्, ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्य को मान्यता दी थी. Shudras एक अलग वर्ण नहीं था लेकिन क्षत्रिय वर्ना का एक हिस्सा भी  थे. शुद्र वही बनता था जो आर्य विचार को नहीं मानता था. लेकिन बाद में एक लग वर्ण बन गया. 
4) और बाद में शूद्र किंग्स और ब्राह्मणों के बीच में नफरत कायम हो गई.
5) ब्राम्हणों के  क्रूरता और oppressions के कारण शुद्र शुद्र ही बने रहे और ब्रह्मण सिर्फ ब्रम्हां ,  ब्राह्मणों  ने शुद्रो को पवित्र धागा   जिसे जनेऊ कहते है  उसे प्रयोग के लिया मन कर दिया जोकि सभी अर्यो के लिए आवश्यक  था.  
6) पवित्र धागा न प्रयोग करने से Shudras सामाजिक अपमानित हो गया और आर्यों से अलग गिनती होने लगी. अब  आर्यों में  वैश्य के रैंक से नीचे गिर गया और 4tha वर्ण के रूप में शुद्र हो गए . 
क्यू:  पांचवें वर्ना की उत्पत्ति के बारे में  आपका क्या विचार है जिसे अछूत कहा जाता है.? 
  उत्तर वैदिक काल में कोई अस्पृश्यता नहीं था.  सभी अपने धर्म सूत्र के अनुसार नियमो का पालम करते थे. कोई जन्म से कोई श्रेष्ट और को निम्न  नहीं था. 
मनु स्मृति में कोई पांचवें वर्ण  है. परन्तु मनु के समय में अस्पृश्यता नहीं था. हम निश्चित रूप से कहना है कि मनु स्मृति अस्पृश्यता का हुक्म देना नहीं था. मनु स्मृति पुस्पमित्र के समय मिलावट  किया गया है. 
जबकि अस्पृश्यता 200 ई. में मौजूद भी  नहीं   था, यह 600 ई. से उभरा था.  

डॉ.  भंडारकर के अनुसार, गाय की हत्या गुप्ता राजाओं द्वारा 4 शताब्दी ई. के आसपास  अपराध  घोषित किया गया था, इसलिए कुछ विश्वास के साथ कह सकते  है कि अस्पृश्यता 400 ई. बाद ही शुरू हुआ है  

क्यू:  क्या एकमात्र कारन है कि  बौद्ध धर्म और Brahminism के बीच नफरत  और युध्ध  के कारन हारे हुए लोग (गुलाम पुरुर्ष)  अछूत  बन गए. 
उत्तर : यही सत्य है. यह ब्राह्मणों ने  बौद्धों के खिलाफ खिलाफ युद्ध किया और उन्हें गुलाम बनाया गया.  
प्रश्न: क्या हम कह सकते हैं कि यही गुलाम  पुरुष बाद में अछूत  बन गए क्योकि वे मज़बूरी में  वे गोमांस  भी खाया? 
 उत्तर: इस सवाल का सकारात्मक जवाब देने में कोई  हिचक नहीं है  इसके सुवे कोई दूसरा उत्तर नहीं है. 
क्यू:  क्या आप मानते है कि अछूत  गैर आर्यन नस्ल से  हैं? 
उत्तर : जैसा कि मैंने पहले कहा है कि , इतिहासकारों  ने गलती कि है 

कि जो आर्यों को एक नस्ल मन है. जोकि पूरी तरह से गलत है.  इस संबंध में, महाभारत के शांति पर्वके 65 Adhyaya के 23 पद्य संदर्भ बनाया जा सकता है. मंत्र  का कहना है: सभी वर्णों में और पूरे Ashramas में एक Dasyus के अस्तित्व पाता. यह इंगित करता है कि शब्द Dasyus एक गैर आर्यन के लिए इस्तेमाल नहीं किया है. 
यदि anthropometry एक विज्ञान है जिस पर निर्भर हो सकता है लोगों की दौड़ निर्धारित है, तो anthropometry के हिंदू समाज के विभिन्न तबको को अलग नस्ल के रूप में बताता हा इसका मै खंडन करता हु. कि अछूत आर्य और द्रविड़ से एक अलग नस्ल हैं. मेराहै कि ब्राह्मण और अछूत एक ही जाति के हैं. यदि ब्राह्मण आर्य कर रहे हैं, अछूत भी आर्य है.यदि ब्राह्मण द्रविड़ हैं, अछूत भी द्रविड़. नस्लीय अस्पृश्यता का सिद्धांत ऐसे तथ्यों के रूप में हम भारत के ethnology के बारे में पता से बहुत कम समर्थन पाता है. नस्लीय अस्पृश्यता के मूल के सिद्धांत इसलिए -23-7-1962 ke baad  परित्यक्त होना चाहिए 

(DB Thengadi, साहित्य सिंधु. प्रकाशन द्वारा परिप्रेक्ष्य)