सोमवार, 19 सितंबर 2011

आर्य और बाबा रामदेव


आर्य और बाबा रामदेव 

आर्यों आज विचार का समय है, क्योंकि बिना 'विचारे जो करे सो पाछे पछताए' और एक आर्य जब मनुष्य की परिभाषा में कहता है की मनुष्य वही जो सत्य और असत्य का विचार/मनन कर काम करे. वेड में भी आया है-"मनुर्भव"-मननशील बन.
पर आज आर्यों ने लगता है मनन करना छोड़ दिया है और बाबा रामदेव को धर्मं अर्थ काम और मोक्ष का अनुगामी मान बैठे हैं. इसी कारन मुझे ये लेख लिखना पड़ रहा है. 
बाबा रामदेव की सभाओं में आर्य विद्वान भी आर्यत्व की बलि चढाते दिखाई पड़ते हैं और वेद विरुद्ध कृत्यों का समर्थन करते दिख जाते हैं. ऐसे समय में आर्य जनता को ही आर्य सिद्धांतों का पाठ इन्हें पढ़ना होगा. आइये विचार करें:-

१. बाबा रामदेव मूर्तिपूजक है. (४ जून से पहले उज्जैन के महाकाल का दृश्य याद करें).
२. बाबा रामदेव शंकराचार्य के सामने दंडवत हुए, माल्यार्पण किया और "ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या" के वेद विरुद्ध मत को स्वीकार किया. 
३. बाबा रामदेव के कांवड़ यात्रा का समर्थन किया और इसे धार्मिक/वैदिक कर्म बताया.
४. बाबा रामदेव ने गंगा की आरती उतारी और उस कर्म को सही करार दिया
५. लिटल चैम्प प्रोग्राम में दुर्गा की आरती उतारी अभी तिथि १७/९/११ को 

ये मूर्तिपूजक बाबा की करामात हैं और इसने आर्यसमाजों पर कब्ज़ा करने की योजना बना रखी है. औषधालय, बिक्री केंद्र बना दिया है आर्य समाजों को!!! 

अरे! वह तो खुद भी कहता है मैं आर्य नही हूँ, फिर भी न जाने किस स्वार्थ, हठ, दुराग्रह के वशीभूत आर्य जन आर्य समाज और आर्य संगठनों को छोड़ मूर्तिपूजक बाबा के चरनदासी हो लिए हैं. अरे!!! स्वयं जाना था तो ऋषि के अदम्य पुरुषार्थ और संघर्ष से बने इस आर्य समाज को क्यों ऋषि हत्यारे के चरणों में भेंट कर रहे हो. सत्यार्थ प्रकाश पढो, ऋषि के बलिदान को जानो उन्होंने कभी सत्य नही छोड़ा चाहे वे किसी भी अवस्था में रहे हों. 

क्या तुम सत्य छोड़ दोगे, जिस समाज ने तुम्हे बोलना सिखाया, तुम्हारी शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति की क्या आज तुम उसी आर्यसमाज की लाश बिछाकर ऋषि द्रोही का समर्थन करोगे????

क्या आर्यसमाज राष्ट्र उन्नति नही कर सकता??? क्या ऋषि के सिद्धांतो से भ्रष्टाचार दूर्र नही हो सकता???? क्या ऋषि सिद्धांतों से विश्व एकता और विश्व बन्धुत्वा संभव नही है???? विचारो आर्यों विचारो!!!! 

और निर्णय करो. ईश्वर हमे मेधा बुद्धि प्रदान करे की हम ऋषि मंतव्यों को समझ सके और आर्य समाज में एकता का प्रसार हो.

अशोक आर्य 

बुधवार, 14 सितंबर 2011

हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं

हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं


जैसा कि हम सबको ज्ञात है कि आज 14 सितम्बर है। इस दिन को हम हिन्दी दिवस के रूप में मनाते हैं। हमारे देश में हिन्दी को राष्ट्रभाषा और राजभाषा कहा जाता है। राष्ट्रभाषा वह भाषा होती है जो पूरे देश में सर्वाधिक बोली व समझी जाती है तथा राजभाषा सरकारी कार्यालयों बैंकों तथा संवैधानिक कार्यों में प्रयोग की जाती है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार भारत की राजभाषा हिन्दी है। उत्तर भारत में हिन्दी पट्टी है जहां कई राज्यों की राजभाषा हिन्दी है। संवैधानिक रूप से हिन्दी को राष्ट्रभाषा नहीं राजभाषा कहा गया है। 14 सितम्बर 1949 ईस्वी को हिन्दी को संघ के संविधान में राजभाषा का स्थान दिया गया और संविधान में सम्यकरूप से इसकी व्याख्या की गई है। हिन्दी भाषा को हम राष्ट्रभाषा के रूप में जानते हैं। हिन्दी भाषा विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाले तीसरी भाषा है। विश्व में 500 से 600 मिलियन लोग हिन्दी भाषी हैं। भारत के पास राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान तो है किन्तु राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी को उचित स्थान अबतक न मिल पाना बड़े दुर्भाग्य की बात है। किसी भी स्वतन्त्र राष्ट्र के लिए राष्ट्रभाषा का होना अनिवार्य है क्योंकि राष्ट्रभाषा समस्त राष्ट्र को एकता के सूत्र में पिरोने वाली, उसकी सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने वाली एवं उसे उसके प्राचीन गौरव का स्मरण दिलाकर उसमें अस्मिता बोध जगाने वाली संजीवनी है। जिसके बिना राष्ट्र मृतप्राय होकर कालान्तर में अपनी सम्प्रभुता भी खो देता है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी ने ठीक ही कहा है कि ‘निज भाषा उन्नति चाहे, सबकौ उन्नति मूल। बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटै न हिय कौ सूल।।’ देश का विकास और राष्ट्रीय चरित्र मातृभाषा में ही सुरक्षित है। इस संबन्ध में महापुरुषों ने मातृभाषा को स्वीकार किया है। स्वामी दयानन्द, विवेकानन्द, तिलक, मालवीय जी तथा विदेशी विद्वान् मैक्समूलर ने हिन्दी की प्रशंसा के पुल बांधे। जापान, चीन, रूस जैसे विकसित देशों ने अपनी मातृभाषा को महत्त्व दिया है और निरन्तर प्रगतिमान हैं। न जाने क्यों भारत ही एक ऐसा देश है जिस अपना कुछ अच्छा नहीं लगता अपितु हर क्षेत्र में विदेशी वस्तुओं की बात तो अलग है, उनकी संस्कृति आकर्षित करती है। इतना ही नहीं विदेशी वस्तुओं के नाम पर भारतीय लोग गौरवान्वित समझने लगे हैं। दुर्भाग्य है कि अंग्रेजी का ज्ञान न रखने वाल वैदिक विद्वान् लोग स्वयं को हेय समझने लगे हैं। अगर हम अपनी मातृभाषा की ओर ध्यान नहीं देंगे तो सचमुच में अपने ही देश में विदेशी हो जायेंगे। इसका परिणाम सबसे अधिक संस्कृति पर पड़ेगा और पड़ रहा है, पड़ गया है, अपनी सनातन संस्कृति का वर्चस्व न रहने पर विश्वस्तर पर लताड़े जाने के अतिरिक्त कुछ न रहेगा। यही कारण था कि स्वामी दयानन्द, गान्धी जैसे सुविज्ञ मातृभाषा के महत्त्व को न नकार सके। मातृभाषा को छोड़कर दूसरों के पिछलग्गू बन जायेंगे। कभी-कभी ऐसा लगता है कि पिछलग्गू हमारी नियति है। पिछलग्गू होने में ही सुख है, वह भी दूसरों का पिछलग्गू होना अच्छा लगता है। परमात्मा  हमें सद्बुद्धि दे। अन्त मेंः-

राजभाषा का हमेशा मान होना चाहिए।
मातृभाषा का उचित सम्मान होना चाहिए।
काम हिन्दी में करें ये ध्यान होना चाहिए।
राष्ट्र की हर शक्ति का उत्थान होना चाहिए।
हिन्दी है मेरे हिन्द की धड़कन।
हिन्दी अपनाओ देश का मान बढ़ाओ
हिन्दी मेरी पहचान। देश की भाषा हिन्दी भाषा।
जय हिन्दी जय हिन्दुस्तान।

कमलेश शुक्ल हिन्दी अध्यापक
गुरुकुल कुरुक्षेत्र

सोमवार, 12 सितंबर 2011

रामदेव बप्पा मोरिया

रामदेव बप्पा मोरिया


भाद्रपद चतुर्दशी को गणेश मूर्तियों का विसर्जन किया गया। इस दिन आस्था चैनल पर सीधा प्रसारण दिखाया जा रहा था। जो समय स्वामी रामदेव जी के उद्बोधन का होता है, ठीक उसी समय ये प्रसारण किया जा रहा था। स्वामी रामदेव जी अपने को वेदभक्त कहते हैं तो क्या यजुर्वेद का यह मन्त्र स्मरण नहीं है ? ‘‘न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः’’ परमात्मा स्वयं कहते हैं कि मेरी कोई प्रतिमा नहीं है, तो फिर ये कैसी वेदभक्ति है ? ये तो सरासर घपला है। महर्षि स्वामी दयानन्द जी महाराज को अपना आदर्श मानने वाले का क्या ये कथन हो सकता है कि भगवान् गणेश कष्टमोचक हैं ? जब आपके आदर्श तथाकथित भगवान् महावीर व बुद्ध होंगे तो निश्चित रूप से आप नास्तिकता की बात करेंगे क्योंकि नास्तिकता को प्रसारित करने वाले यही दो महानुभाव थे। यदि आप विवेकानन्द जी को अपना आदर्श मानोगे तो मूर्तिपूजा व अन्य वे कार्य भी करने को प्रेरित होंगे जो उनकी मान्यता है। यदि आप कावड़ियों स्वागत इसिलिये करोगे की ये शिवभक्त हैं तो आप विजया के सेवन का विरोध कैसे करेंगे ? स्वामी दयानन्द जी ने भारत के पतन के प्रमुख कारणों में मूर्तिपूजा को स्वीकार किया है। यदि इसका विरोध नहीं कर सकते तो कम से कम पक्ष तो मत लो यदि आप इसका विरोध करेंगे तो आप कह सकते हैं कि वेद में ऐसा कहीं नहीं लिखा है। और आपको तो सभी मतावलम्बी आर्यसमाजी ही मानते हैं, फिर किस बात का डर है। वेद के साथ घालमेल मत कीजिए।

शनिवार, 10 सितंबर 2011

अपराधी को मृत्युदण्ड

अपराधी को मृत्युदण्ड की माफी की राजनीति !


आधुनिक युग में मृत्यु दण्ड को उचित नहीं ठहराने के लिए बहुत चर्चा-परिचर्चा चलती रही है। ये सोच मानवाधिकार को लेकर कुछ ज्यादा चलती है। इस सबको करने से पहले शायद हम यह विचारना भूल जाते हैं कि जिसके प्रति अपराध हुआ क्या उसका कोई मानवाधिकार नहीं था ? आधुनिकता का ये कभी अभिप्राय नहीं होता की आप उन को दण्ड न दें जो मानवता का अपराधी है। जीने का अधिकार सबको है लेकिन उसका भी एक पैमाना तो होना ही चाहिए। राजनैतिक लाभ के लिए यदि कुछ ऐसी परम्पराओं को जन्म दे दिया जाता है, जिसकी हानि आखिर भविष्य में उठानी ही पड़ती है। इस तुच्छ व संकीर्ण मानसिकता के चलते जातिवाद का जहर पहले समाज जहर घोल रहा है। आज यदि अपराध बढ़ रहे हैं तो क्या उसके पीछे यही कारक कार्य नहीं कर रहा है ? आवश्यकता इस बात की है कि हम अपराध की प्रवृत्ति पर किस प्रकार से अंकुश लगा सकते हैं। एक ऐसे प्रधानमन्त्री जिसने सम्भवतः सर्वप्रथम भ्रष्टाचार के कारक को बताने का साहस किया उसके अपराधियों को एक राज्य सरकार द्वारा माफी दिए जाने की जो साजिश रची है उसका प्रबल व व्यापक विरोध होना ही चाहिए। ऐसे लोगों को बेनकाब कर सत्ता से पदच्युत कर देना चाहिए, अन्यथा एक ऐसी संकीर्ण मानसिकता का व्यापक प्रभाव सम्पूर्ण मानवता के लिए हानिप्रद होगा। इसके साथ ही दण्ड प्रक्रिया को लम्बित करना भी अपराध व अपराधियों को बढ़ते देने का एक कारक है। इस प्रकार के कार्यों के लिए निश्चित रूप से न्यायिक प्रणाली को दुरुस्त करने की महती आवश्यकता है, तभी हम राजनैतिकों के द्वारा किये जाने वाले पक्षपात से बच सकेंगे।


नन्दकिशोर आर्य
गुरुकुल कुरुक्षेत्र
हरियाणा