सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

हो समय ने फिर ललकारा है---



हो समय ने फिर ललकारा है।
देश धर्म द्रोहियों से लड़ना हमारा नारा है।।स्थाई।।

हम भारत के वासी हमारा राज प्रजातन्त्र है।
वेदों के उपासक हमारी संस्कृति पवित्रा है।
खुद जीयें और जीने दें ऐसा हमारा चरित्र है।
कभी इन्सानियत से हमने रिश्ता तोड़ा नहीं।
सच्चाई कि रास्ते से हमने मुंह मोड़ा नहीं।
जिसने हमको छेड़ा पहले उसको हमने छोड़ा नहीं।
हो जानता यह जग सारा है
बड़े-बड़े खूंखारों का हमने मुंह मारा है।।1।।

देश की अखण्डता को खण्डित नहीं होने देंगे।
आपस में हम फूट के बीज नहीं बोने देंगे।
आजादी रूपी दौलत को हरगिज नहीं खोने देंगे।
 जो करते हैं बकवास आज गैरों के इशारों पर।
लानत है ऐसे देश द्रोही गद्दारों पर ।
करें न विश्वास कभी भूलकर मक्कारों पर।
 हो हुआ दिल दुःखी हमारा है।
ईंट का जवाब देंगे पत्थर से और न चारा है।।2।।

गर पहले हमारे नेता ऐसी गलती खाते ना।
तो आज के ये दिन कभी देखने में आते ना।
मुट्ठी भर ये लोग कभी शोर यों मचाते ना।
हमने इनकी नीयत को अच्छी तरह पहचाना है।
चण्डीगढ़ का फैसला तो झूठा सा बहाना है।
सिर्फ इनका एक खालिस्तान का निशाना है।
हो खास गैरों का इशारा है।
हो खुलमखुल्ला पापिस्तान ये नाच नचारा है।।3।।

देश को जरूरत है मजबूत कर्णधारों की।
देश को जरूरत है पटेल से सरदारों की।
देश को जरूरत नहीं इन फिल्मी सितारों की।
कुर्सी के पुजारी अपनी कुर्सी को बचाते रहेंगे।
ये कर दिया वो कर दिया शोर यों मचाते रहेंगे।
उधर बेगुनाहों का खून वो बहाते रहेंगे।
हो बड़ा ये खतरा भारा है
कहे ‘खेमसिंह’ कहीं देश का ना हो जाये बटवारा है।।4।।

गुरुवार, 24 जनवरी 2013

स्वयं को पहचानें

स्वयं को पहचानें

मानव जीवन स्वयं को जानने का अनमोल क्षण 

युगों से चले आ रहे इस परिवर्तनशील संसार में सब अस्थिर सा दिखलाई देता है। भूमि पर स्थित सभी पदार्थों में कालान्तर में परिवर्तन दिखाई पड़ता है। भूमि पर बीज के गिरने के बाद मिट्टी, पानी, खाद, हवा, उष्मा व समय के अनुसार वह बीज अंकुरित हो लहलहाने लगता है, पुष्प, पराग, फल  आये व पौधा विशीर्ण हो जाता है, लेकिन अपनी समाप्ति के बाद भी वह अनेक बीज उत्पन्न कर जाता है। एक भ्रूण बालक-बालिका के रूप में जन्म लेकर विभिन्न शारीरिक शिशु, बाल, किशोर, कुमार, युवा, प्रौढ़ व वृद्ध आदि अवस्थाओं को प्राप्त कर कालकवलित हो जाता है। क्या सब कुछ ऐसे ही समाप्त होने वाला है, या कुछ ऐसा भी तत्त्व हो जो शाश्वत है, अजर या अमर है ? जब व्यक्ति अपने चर्म चक्षुओं व अन्य इन्द्रियों से संसार में स्थिर आनन्द प्रदान करने वाली वस्तुओं का उपभोग करता है, तो वे उसको शाश्वत आनन्द प्रदान न कर क्षणिक, अल्प व दुःख मिश्रित आनन्द प्रदान करती हैं। आजीवन मानव ढेर सारे भौतिक पदार्थों को संचित करता है कि हो सकता है कि अमुख पदार्थ की प्राप्ति से उसे अनन्त सुख की प्राप्ति हो जायेगी लेकिन ये क्या वस्तु प्राप्ति के बाद ही उसकी उत्कट आनन्द की अभिलाषा समाप्त हो जाती है। उपनिषद् कहते हैं न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यः अर्थात् केवल भौतिक पदार्थों के संचय से मानव की तृप्ति नहीं होने वाली है। 
इस संसार में वह कौनसा तत्त्व है जिसको जानने के बाद अतुला पृथ्वी का स्वामी व्यक्ति उसे छोड़ने को तत्पर हो जाता है, वह कौनसा तत्त्व है जिसको जानने की इच्छा नचिकेता ने यमाचार्य से की, यमाचार्य के द्वारा अनन्त धन-ऐश्वर्य उसके बदले में देने चाहे लेकिन नचिकेता ने उन सबको नश्वर बतलाकर उन पदार्थों से किनारा कर लिया व केवल उसी तत्त्व को जानने की इच्छा प्रकट की ? वह तत्त्व जिसको जानने के लिए अनेकों ऋषि- महर्षियों ने आजीवन तप किया ? छोटा सा बालक अभी जिसको संसार में आये केवल 10-11 दिन ही बीते हैं उसका नामकरण-संस्कार करते समय उसका पिता वेद मंत्र के माध्यम से उससे पूछता है कोऽसि कतमोऽसि कस्यासि को नामासि अर्थात् तू कौन है, तेरा कौनसा जन्म है तू किसका है तेरा नाम क्या है ? वह छोटा अबोध बालक उत्तर देने में असमर्थ है लेकिन पिता उसको उसी मन्त्र में उसका उत्तर भी देता है कि हे बालक ! अमृतोऽसि तू अमृत है तू मरणधर्मा नहीं अपितु अजर व अमर है।
इस मानव जीवन को जीने की दो पद्धतियां हमारे सामाजिक उन्नायकों ने हमें प्रदान की है पहली पद्धति श्रेय व दूसरी पद्धति प्रेय अर्थात् श्रेय अध्यात्म व प्रेय भौतिक उन्नति को साथ-साथ करने निर्देश दिया। अध्यात्म का पथ हमें स्वयं को जानने व भौतिक पथ संसार को जानने का मार्ग दिखलाता है। जो सशरीर सांसारिक संबन्ध हमारे व्यवहारिक जीवन में दिखलाई पड़ते हैं वे आवश्यकता व कार्य के कारण बनते बिगड़ते रहते हैं, लेकिन इसके अतिरिक्त जो हमारी स्वयं की आत्मिक अर्थात् आत्मा के रूप में अनुभूति है वह हमारी स्वयं की पहचान है। एक ही जीवन में हमारे विभिन्न सांसारिक सम्बन्ध होते हैं यह हमारे शरीर की पहचान है, इसके विपरीत हमारी अपनी व्यक्तिगत आत्मिक पहचान है वही हमारी असली पहचान है। अब प्रश्न उठता है कि इसकी पहचान कैसे की जाये क्या ऐसे उपाय हैं कि जिसके माध्यम से हम स्वयं की पहचान कर सकें, स्वयं को शरीर के रूप में नहीं अपितु आत्मा के रूप में जान सकें ? क्या ऐसा किसी ने जाना भी है या नहीं ? इन तमाम सवालों के जवाब सदियों से भारतीय अध्यात्मिक परम्परा में खोजे जाते रहे हैं, हमारे ऋषियों ने इन रहस्ययुक्त सवालों के जवाब ढूंढ़कर आमजन के लिए स्वयं को जानने व पहचानने के जवाब सूत्र रूप में उपस्थित किये हैं।
मोटे तौर पर मुख्य रूप से तीन प्रकार के तत्त्व इस संसार में बतलाये गये हैं प्रथम ईश्वर द्वितीय आत्मा व तृतीय प्रकृति इनमें से हमारी पहचाना आत्मा के रूप में होती है। स्वयं को जानने के भी तीन उपाय बतलाये गये हैं शुद्ध ज्ञान, शुद्ध कर्म व शुद्ध उपासना। एक छात्र जिसको विभिन्न प्रतियोगी परिक्षाओं में उत्तीर्ण होना है तो निश्चित रूप से उसे निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुसार उसे सही पुस्तकों व सही प्रशिक्षक से प्रशिक्षण लेना होगा व उसके दिशा-निर्देशों के अनुसार परीक्षा की तैयारी करनी होगी व अपने विवेक से भी सही निर्णण लेने होंगे तो निश्चय ही उसको सफलता की प्राप्ति होगी यदि व गलत ज्ञान व गलत तरीकों का प्रयोग करेगा तो निश्चय ही उसे असफलता का मुख देखना होगा इसी प्रकार से हमें अपने स्वयं के ज्ञान हेतु सर्वप्रथम शुद्ध ज्ञान की आवश्यकता होगी। शुद्ध ज्ञान की परख करने के लिए भी विभिन्न उपाय व कसौटियां हमारे समक्ष उपलब्ध हैं उनसे शुद्ध ज्ञान ही को ग्रहण करना, शुद्ध ज्ञान की प्राप्ति के साधन स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यं अर्थात् स्वाध्याय प्रवचन से प्रमाद न करना स्वाध्याय के अन्तर्गत दो बातें मुख्यरूप से आती हैं एक स्व$अध्ययन अपने आपको जानना दूसरा योग्य विद्वानों के ग्रन्थों का अध्ययन, चिन्तन, मनन करना और उन्हीं बातों से अन्य व्यक्तियों को अवगत कराना। कबीरा जब आये जगत में जग हंसा हम रोये।ऐसी करनी कर चलें, हम हंसंे जग रोये।।
केवल शुद्ध ज्ञान से हमारी स्वयं की पहचान नहीं हो पायेगी, जो हमने सीखा है उसको अपने जीवन में शुद्धकर्म करके उतारना भी आवश्वयक है। स्वयं को जानने के कुछ उपाय योगदर्शनकार ने बताये हैं जिनमें मुख्यरूप से योग के आठ अंग हैं जिनमें यम, नियम, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान व समाधि हैं। इनमें से प्रथम दो अंग यम व नियम हमारे सामाजिक जीवन से जुडे़ हुए हैं। हमारा व्यक्तिगत व सामाजिक जीवन समान होना चाहिए। यम अंग में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह व नियम अंग में शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय व ईश्वरप्रणिधान हैं। हमारे अनेक महापुरुषों ने अहिंसा को परमधर्म तक घोषित किया है। अहिंसा का मतलब वैरत्याग अर्थात् समस्त प्राणियों में मित्रभाव रखना। मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे। सत्य जो प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से सत्य ही हो उसी बात को मानना व करना। अस्तेय के लिए वेद में आया है मा गृधः कस्य स्विद्धनम् अर्थात् मनसा वाचा कर्मणा किसी की वस्तु चाहना न करना। ब्रह्मचर्य संयमित व संतुलित जीवन जीना। अपरिग्रह हानिकारक व अनावश्यक विचारों व वस्तुओं का संग्रह न करना। शौच- शरीर की जल से, मन की सत्य से, आत्मा की तप व विद्या से व बुद्धि की ज्ञान से शुद्धता रखना। सन्तोष- अपने पूर्ण पुरुषार्थ व परिश्रम से प्राप्त धन व वस्तुओं से सन्तुष्ट रहना। तप-श्रेष्ठ कार्यों को करते हुए द्वन्द्वों को सहना जैसे सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास, मान-अपमान, हानि-लाभ, जय-पराजय आदि। ईश्वरप्रणिधान- ईश्वर को अर्थात् परम सत्ता को स्मरण रखते हुए सभी कार्य करना। 
इस दुनिया में स्वयं को जानना सबसे बड़ी चुनौति भी है व कार्य भी, उपनिषद्कार कहते हैं आत्मा वा अरे द्रष्टव्यो श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः। स्वयं को देखना सुनना मानना व जानना ही परम लक्ष्य होना चाहिए। वेदानुसार नान्य पन्था विद्यते अयनाय इसको जानने के अलावा अन्य को मार्ग नहीं है। स्वयं को जानने के उपायों में प्रमुख कार्य नित्य प्रतिदिन प्रातः च सांयकाल आत्मचिन्तन करना जिस प्रकार एक वणिक् अपने प्रतिदिन के आय-व्यय का विवरण लिखता व देखता है उसी प्रकार स्वयं को जानने के लिए भी अपने नित्य प्रति के व्यवहारों व क्रियाकलापों को देखते व जानते रहना चाहिए। नकारात्मक विचारों को कोई जगह अपने जीवन में न दें। अपने सभी कार्यों में अपनी आत्मिक अनुभूति को ही सामने रखना चाहिए। सब जड़-चेतनादिकों में परमसत्ता परमात्मा को व भिन्न-भिन्न अपनी ही जैसी आत्माओं की अनुभूति करनी चाहिए। वास्तव में विद्वान् व श्रेष्ठ नर वही होता है जो आत्मवत् सर्वभूतेषु की पवित्र भावना को अपने में संजोये रखता है।
 भारतीय संस्कारों की परम्परा में एक छोटे से अबोध बालक को भी उसको स्वयं को जानने का सूत्र प्रदान कर दिया जाता है तो यह महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि हम स्वयं को अपने असल रूप में पहचानें। स्वयं को जानने से ही सबको जान लेने व उचित व्यावहारिक निर्णय लेने की क्षमता हमारे में पैदा होती है। मैं कौन हूँ का प्रश्न व इसका उत्तर आत्मा के रूप अपने साथ अवश्य रखें इसी में हम सब का कल्याण सन्निहित है।

लेखन-
नंदकिशोर आर्य 
गुरुकुल कुरुक्षेत्र 

गुरुवार, 1 नवंबर 2012

किस-किस चीज को साथ नहीं खाना चाहिए--




स्वदेशी अपनाओ देश बचाओ
आयुर्वेद के मुताबिक किस-किस चीज को साथ नहीं खाना चाहिए और क्यों, जानते हैं :

दूध के साथ दही लें या नहीं? दूध और दही दोनों की तासीर अलग होती है। दही एक खमीर वाली चीज है। दोनों को मिक्स करने से बिना खमीर वाला खाना (दूध) खराब हो जाता है। स
ाथ ही, एसिडिटी बढ़ती है और गैस, अपच व उलटी हो सकती है। इसी तरह दूध के साथ अगर संतरे का जूस लेंगे तो भी पेट में खमीर बनेगा। अगर दोनों को खाना ही है तो दोनों के बीच घंटे-डेढ़ घंटे का फर्क होना चाहिए क्योंकि खाना पचने में कम-से-कम इतनी देर तो लगती ही है।

दूध के साथ तला-भुना और नमकीन खाएं या नहीं? दूध में मिनरल और विटामिंस के अलावा लैक्टोस शुगर और प्रोटीन होते हैं। दूध एक एनिमल प्रोटीन है और उसके साथ ज्यादा मिक्सिंग करेंगे तो रिएक्शन हो सकते हैं। फिर नमक मिलने से मिल्क प्रोटींस जम जाते हैं और पोषण कम हो जाता है। अगर लंबे समय तक ऐसा किया जाए तो स्किन की बीमारियां हो सकती हैं। आयुर्वेद के मुताबिक उलटे गुणों और मिजाज के खाने लंबे वक्त तक ज्यादा मात्रा में साथ खाए जाएं तो नुकसान पहुंचा सकते हैं। लेकिन मॉडर्न मेडिकल साइंस ऐसा नहीं मानती।

सोने से पहले दूध पीना चाहिए या नहीं? आयुर्वेद के मुताबिक नींद शरीर के कफ दोष से प्रभावित होती है। दूध अपने भारीपन, मिठास और ठंडे मिजाज के कारण कफ प्रवृत्ति को बढ़ाकर नींद लाने में सहायक होता है। मॉडर्न साइंस में भी माना जाता है कि दूध नींद लाने में मददगार होता है। इससे सेरोटोनिन हॉर्मोन भी निकलता है, जो दिमाग को शांत करने में मदद करता है। वैसे, दूध अपने आप में पूरा आहार है, जिसमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और कैल्शियम होते हैं। इसे अकेले पीना ही बेहतर है। साथ में बिस्किट, रस्क, बादाम या ब्रेड ले सकते हैं, लेकिन भारी खाना खाने से दूध के गुण शरीर में समा नहीं पाते।

दूध में पत्ती या अदरक आदि मिलाने से सिर्फ स्वाद बढ़ता है, उसका मिजाज नहीं बदलता। वैसे, टोंड दूध को उबालकर पीना, खीर बनाकर या दलिया में मिलाकर लेना और भी फायदेमंद है। बहुत ठंडे या गर्म दूध की बजाय गुनगुना या कमरे के तापमान के बराबर दूध पीना बेहतर है।

नोट : अक्सर लोग मानते हैं कि सर्जरी या टांके आदि के बाद दूध नहीं लेना चाहिए क्योंकि इससे पस पड़ सकती है, यह गलतफहमी है। दूध में मौजूद प्रोटीन शरीर की टूट-फूट को जल्दी भरने में मदद करते हैं। दूध दिन भर में कभी भी ले सकते हैं। सोने से कम-से-कम एक घंटे पहले लें। दूध और डिनर में भी एक घंटे का अंतर रखें।

खाने के साथ छाछ लें या नहीं? छाछ बेहतरीन ड्रिंक या अडिशनल डाइट है। खाने के साथ इसे लेने से खाने का पाचन भी अच्छा होता है और शरीर को पोषण भी ज्यादा मिलता है। यह खुद भी आसानी से पच जाती है। इसमें अगर एक चुटकी काली मिर्च, जीरा और सेंधा नमक मिला लिया जाए तो और अच्छा है। इसमें अच्छे बैक्टीरिया भी होते हैं, जो शरीर के लिए फायदेमंद होते हैं। मीठी लस्सी पीने से फालतू कैलरी मिलती हैं, इसलिए उससे बचना चाहिए। छाछ खाने के साथ लेना या बाद में लेना बेहतर है। पहले लेने से जूस डाइल्यूट हो जाएंगे।

दही और फल एक साथ लें या नहीं? फलों में अलग एंजाइम होते हैं और दही में अलग। इस कारण वे पच नहीं पाते, इसलिए दोनों को साथ लेने की सलाह नहीं दी जाती। फ्रूट रायता कभी-कभार ले सकते हैं, लेकिन बार-बार इसे खाने से बचना चाहिए।

आयुर्वेद के मुताबिक परांठे या पूरी आदि तली-भुनी चीजों के साथ दही नहीं खाना चाहिए क्योंकि दही फैट के पाचन में रुकावट पैदा करता है। इससे फैट्स से मिलनेवाली एनर्जी शरीर को नहीं मिल पाती।

दूध के साथ फल खाने चाहिए या नहीं? दूध के साथ फल लेते हैं तो दूध के अंदर का कैल्शियम फलों के कई एंजाइम्स को एड्जॉर्ब (खुद में समेट लेता है और उनका पोषण शरीर को नहीं मिल पाता) कर लेता है। संतरा और अनन्नास जैसे खट्टे फल तो दूध के साथ बिल्कुल नहीं लेने चाहिए। व्रत वगैरह में बहुत से लोग केला और दूध साथ लेते हैं, जोकि सही नहीं है। केला कफ बढ़ाता है और दूध भी कफ बढ़ाता है। दोनों को साथ खाने से कफ बढ़ता है और पाचन पर भी असर पड़ता है। इसी तरह चाय, कॉफी या कोल्ड ड्रिंक के रूप में खाने के साथ अगर बहुत सारा कैफीन लिया जाए तो भी शरीर को पूरे पोषक तत्व नहीं मिल पाते।

मछली के साथ दूध पिएं या नहीं? दही की तासीर ठंडी है। उसे किसी भी गर्म चीज के साथ नहीं लेना चाहिए। मछली की तासीर काफी गर्म होती है, इसलिए उसे दही के साथ नहीं खाना चाहिए। इससे गैस, एलर्जी और स्किन की बीमारी हो सकती है। दही के अलावा शहद को भी गर्म चीजों के साथ नहीं खाना चाहिए।

फल खाने के फौरन बाद पानी पी सकते हैं, खासकर तरबूज खाने के बाद? फल खाने के फौरन बाद पानी पी सकते हैं, हालांकि दूसरे तरल पदार्थों से बचना चाहिए। असल में फलों में काफी फाइबर होता है और कैलरी काफी कम होती है। अगर ज्यादा फाइबर के साथ अच्छा मॉइश्चर यानी पानी भी मिल जाए तो शरीर में सफाई अच्छी तरह हो जाती है। लेकिन तरबूज या खरबूज के मामले में यह थ्योरी सही नहीं बैठती क्योंकि ये काफी फाइबर वाले फल हैं। तरबूज को अकेले और खाली पेट खाना ही बेहतर है। इसमें पानी काफी ज्यादा होता है, जो पाचन रसों को डाइल्यूट कर देता है। अगर कोई और चीज इसके साथ या फौरन बाद/पहले खाई जाए तो उसे पचाना मुश्किल होता है। इसी तरह, तरबूज के साथ पानी पीने से लूज-मोशन हो सकते हैं। वैसे तरबूज अपने आप में काफी अच्छा फल है। यह वजन घटाने के इच्छुक लोगों के अलावा शुगर और दिल के मरीजों के लिए भी अच्छा है।

खाने के साथ फल नहीं खाने चाहिए। कार्बोहाइड्रेट और प्रोटींस के पाचन का मिकैनिज्म अलग होता है। कार्बोहाइड्रेट को पचानेवाला स्लाइवा एंजाइम एल्कलाइन मीडियम में काम करता है, जबकि नीबू, संतरा, अनन्नास आदि खट्टे फल एसिडिक होते हैं। दोनों को साथ खाया जाए तो कार्बोहाइड्रेट या स्टार्च की पाचन प्रक्रिया धीमी हो जाती है। इससे कब्ज, डायरिया या अपच हो सकती है। वैसे भी फलों के पाचन में सिर्फ दो घंटे लगते हैं, जबकि खाने को पचने में चार-पांच घंटे लगते हैं। मॉडर्न मेडिकल साइंस की राय कुछ और है। उसके मुताबिक, फ्रूट बाहर एसिडिक होते हैं लेकिन पेट में जाते ही एल्कलाइन हो जाते हैं। वैसे भी शरीर में जाकर सभी चीजें कार्बोहाइड्रेट, फैट, प्रोटीन आदि में बदल जाती हैं, इसलिए मॉडर्न मेडिकल साइंस तरह-तरह के फलों को मिलाकर खाने की सलाह देता है।

मीठे फल और खट्टे फल एक साथ न खाएं आयुर्वेद के मुताबिक, संतरा और केला एक साथ नहीं खाना चाहिए क्योंकि खट्टे फल मीठे फलों से निकलनेवाली शुगर में रुकावट पैदा करते हैं, जिससे पाचन में दिक्कत हो सकती है। साथ ही, फलों की पौष्टिकता भी कम हो सकती है। मॉडर्न मेडिकल साइंस इससे इत्तफाक नहीं रखती।

खाने के साथ पानी पिएं या नहीं? पानी बेहतरीन पेय है, लेकिन खाने के साथ पानी पीने से बचना चाहिए। खाना लंबे समय तक पेट में रहेगा तो शरीर को पोषण ज्यादा मिलेगा। अगर पानी ज्यादा लेंगे तो खाना फौरन नीचे चला जाएगा। अगर पीना ही है तो थोड़ा पिएं और गुनगुना या नॉर्मल पानी पिएं। बहुत ठंडा पानी पीने से बचना चाहिए। पानी में अजवाइन या जीरा डालकर उबाल लें। यह खाना पचाने में मदद करता है। खाने से आधा घंटा पहले या एक घंटा बाद गिलास भर पानी पीना अच्छा है।

लहसुन या प्याज खाने चाहिए या नहीं? लहसुन और प्याज को रोजाना के खाने में शामिल किया जाना चाहिए। लहसुन फैट कम करता है और बैड कॉलेस्ट्रॉल (एलडीएल) घटाकर गुड कॉलेस्ट्रॉल (एचडीएल) बढ़ाता है। इसमें एंटी-बॉडीज और एंटी-ऑक्सिडेंट गुण होते हैं। प्याज से भूख बढ़ती है और यह खून की नलियों के आसपास फैट जमा होने से रोकता है। लंबे समय तक इसके इस्तेमाल से सर्दी-जुकाम और सांस संबंधी एलर्जी का मुकाबला अच्छे से किया जा सकता है। लहसुन और प्याज कच्चा या भूनकर, दोनों तरह से खा सकते हैं। लेकिन लहसुन कच्चा खाना बेहतर है। कच्चे लहसुन को निगलें नहीं, चबाकर खाएं क्योंकि कच्चा लहसुन कई बार पच नहीं पाता। साथ ही, उसमें कई ऐसे तेल होते हैं, जो चबाने पर ही निकलते हैं और उनका फायदा शरीर को मिलता है।

परांठे के साथ दही खाएं या नहीं? आयुर्वेद के मुताबिक परांठे या पूरी आदि तली-भुनी चीजों के साथ दही नहीं खाना चाहिए क्योंकि दही फैट के पाचन में रुकावट पैदा करता है। इससे फैट्स से मिलनेवाली एनजीर् शरीर को नहीं मिल पाती। दही खाना ही है तो उसमें काली मिर्च, सेंधा नमक या आंवला पाउडर मिला लें। हालांकि रोटी के साथ दही खाने में कोई परहेज नहीं है। मॉडर्न साइंस कहता है कि दही में गुड बैक्टीरिया होते हैं, जोकि खाना पचाने में मदद करते हैं इसलिए दही जरूर खाना चाहिए।

फैट और प्रोटीन एक साथ खाएं या नहीं? घी, मक्खन, तेल आदि फैट्स को पनीर, अंडा, मीट जैसे भारी प्रोटींस के साथ ज्यादा नहीं खाना चाहिए क्योंकि दो तरह के खाने अगर एक साथ खाए जाएं, तो वे एक-दूसरे की पाचन प्रक्रिया में दखल देते हैं। इससे पेट में दर्द या पाचन में गड़बड़ी हो सकती है।

दूध, ब्रेड और बटर एक साथ लें या नहीं? दूध को अकेले लेना ही बेहतर है। तब शरीर को इसका फायदा ज्यादा होता है। आयुर्वेद के मुताबिक प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और फैट की ज्यादा मात्रा एक साथ नहीं लेनी चाहिए क्योंकि तीनों एक-दूसरे के पचने में रुकावट पैदा कर सकते हैं और पेट में भारीपन हो सकता है। मॉडर्न साइंस इसे सही नहीं मानता। उसके मुताबिक यह सबसे अच्छे नाश्तों में से है क्योंकि यह अपनेआप में पूरा है।

तरह-तरह की डिश एक साथ खाएं या नहीं? एक बार के खाने में बहुत ज्यादा वैरायटी नहीं होनी चाहिए। एक ही थाली में सब्जी, नॉन-वेज, मीठा, चावल, अचार आदि सभी कुछ खा लेने से पेट में खलबली मचती है। रोज के लिए फुल वैरायटी की थाली वाला कॉन्सेप्ट अच्छा नहीं है। कभी-कभार ऐसा चल जाता है।

खाने के बाद मीठा खाएं या नहीं? मीठा अगर खाने से पहले खाया जाए तो बेहतर है क्योंकि तब न सिर्फ यह आसानी से पचता है, बल्कि शरीर को फायदा भी ज्यादा होता है। खाने के बाद में मीठा खाने से प्रोटीन और फैट का पाचन मंदा होता है। शरीर में शुगर सबसे पहले पचता है, प्रोटीन उसके बाद और फैट सबसे बाद में।

खाने के बाद चाय पिएं या नहीं? खाने के बाद चाय पीने से कई फायदा नहीं है। यह गलत धारणा है कि खाने के बाद चाय पीने से पाचन बढ़ता है। हालांकि ग्रीन टी, डाइजेस्टिव टी, कहवा या सौंफ, दालचीनी, अदरक आदि की बिना दूध की चाय पी सकते हैं।

छोले-भठूरे या पिज्जा/बर्गर के साथ कोल्ड ड्रिंक्स लें या नहीं? कोल्ड ड्रिंक में मौजूद एसिड की मात्रा और ज्यादा शुगर फास्ट फूड (पिज्जा, बर्गर, फ्रेंच फ्राइस आदि) में मौजूद फैट के साथ अच्छा नहीं माना जाता। तला-भुना खाना एसिडिक होता है और शुगर भी एसिडिक होती है। ऐसे में दोनों को एक साथ लेना सही नहीं है। साथ ही बहुत गर्म और ठंडा एक साथ नहीं खाना चाहिए। गर्मागर्म भठूरे या बर्गर के साथ ठंडा कोल्ड ड्रिंक पीना शरीर के तापमान को खराब करता है। स्नैक्स में मौजूद फैटी एसिड्स शुगर का पाचन भी खराब करते हैं। फास्ट फूड या तली-भुनी चीजों के साथ कोल्ड ड्रिंक के बजाय जूस, नीबू-पानी या छाछ ले सकते हैं। जूस में मौजूद विटामिन-सी खाने को पचाने में मदद करता है।

भारी काबोर्हाइड्रेट्स के साथ भारी प्रोटीन खाएं या नहीं? मीट, अंडे, पनीर, नट्स जैसे प्रोटीन ब्रेड, दाल, आलू जैसे भारी कार्बोहाइड्रेट्स के साथ न खाएं। दरअसल, हाई प्रोटीन को पचाने के लिए जो एंजाइम चाहिए, अगर वे एक्टिवेट होते हैं तो वे हाई कार्बो को पचाने वाले एंजाइम को रोक देते हैं। ऐसे में दोनों का पाचन एक साथ नहीं हो पाता। अगर लगातार इन्हें साथ खाएं तो कब्ज की शिकायत हो सकती है।

note : हम फास्ट फ़ूड और मांसाहार के विरोधी है क्योकि यह हमारे धर्म और संस्कृति के विरुद्ध है|
साभार : स्वेदेशी अपनाओ देश बचाओ 

मंगलवार, 4 सितंबर 2012

जीवन में अनुशासन का महत्त्व


जीवन में अनुशासन का महत्त्व

नन्दकिशोर आर्य 
गुरुकुल कुरुक्षेत्र 

इस परिवर्तनशील संसार में जीव-आत्मा के लिए दो प्रकार की योनियां मानी जाती हैं एक कर्म व दूसरी भोग योनी। संसार के सभी प्राणियों में यदि कर्म करने की स्वतन्त्रता किसी के पास है तो वह मात्र मनुष्य देह में विद्यमान आत्मा के पास है। बाकी सब प्राणी नियती द्वारा निश्चित किये गये कर्म करते हुये अपने जीवन का निर्वाह करते हैं। जो मानव जीवन हमें वर्तमान में मिला है उसको हम सार्थक कैसे कर सकते हैं ? यह विचारणीय विषय है। मानव को कर्म करने की स्वतन्त्रता तो है लेकिन फल प्राप्ति में कहीं-कहीं परतन्त्रता भी है। वे कर्म जिनको करने से व्यक्ति के जीवन का सर्वांगीण विकास होता है, उसे अपनाकर ही वह महान् बनने के स्वप्न ही नहीं देख सकता, अपितु उन्हें साकार रूप भी प्रदान कर सकता है। प्रश्न उठता है कि आखिर उन स्वप्नों को साकार कैसे किया जाए ? इन सभी प्रश्नों का मात्र एक ही शब्द में उत्तर हो सकता है ‘अनुशासन’
अनुशासन संस्कृत का वह अनुपम शब्द है जिसके माध्यम से आचार्य अपने छात्र को शिष्य के रूप में धारण करता है। आचार्य द्वारा अनुशिष्ट छात्र निश्चित रूप से उत्तम अनुशासित मानव बनता है। अनु उपसर्ग पूर्वक शास् धातु व ल्युट प्रत्यय के योग से बने इस शब्द का अभिप्राय है नियम के अनुकूल आचरण करना। वे नियम क्या हैं ? उनका निर्धारण कौन करेगा ? निर्धारकों द्वारा निर्धारित नियमों को कसौटि पर कौन कसेगा ? वे स्रोत कौन से हैं जिनसे हम सही नियमों को जान सकते हैं ? श्रुति स्मृति सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः एतच्चतुर्विधं प्राहः साक्षात् धर्मस्य लक्षणम्।। वेद, स्मृति, उपनिषद्, गीता आदि ग्रन्थ, श्रेष्ठ लोगों का आचारण व अपने द्वारा किये गये प्रिय कार्य ये सभी कर्त्तव्य के साक्षात् लक्षण हैं। आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् अर्थात् जिस कार्य को मैं अपने लिए प्रिय नहीं मानता उनको दूसरों के लिए भी न किया जाये यही श्रेष्ठाचार है। परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्। परोपकार पुण्य के लिए व दूसरों को पीड़ा देना पाप की कोटि में आता है। महान् विचारक महर्षि दयानन्द जी ने सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है कि जिन कार्यों के करने में शंका, लज्जा व भय की उत्पत्ति हो ऐसे कार्यों के करने से बचना चाहिए व जिन कार्यों के करने में उत्साह, आनन्द व निर्भयता उत्पन्न होवे ऐसे कार्यों को करना उत्तम है। महान् वैज्ञानिकों ने अपने अनुसन्धान में पाया है कि यह सृष्टि नियम पूर्वक अपने कार्यों को पूर्ण कर रही है। सूर्य का समय पर उदय व अस्त होना, शुक्ल व कृष्ण पक्ष में चन्द्रमा की कलाओं का बढ़ना, घटना, पृथ्वी सहित असंख्य तारागण अपने नियमानुकूल भ्रमण करते हुए अपने कार्य को अंजाम दे रहें हैं। इन जड़ देवताओं से हम अपने जीवन को उन्नत बनाने के लिए अनुशासन का पाठ सीख सकते हैं। वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक व राष्ट्रीय दृष्टि से हम अनुशासन को व्याख्यायित कर सकते हैं।

वैयक्तिक अनुशासन सभी कष्टों से बचने का अचूक प्रयोग है, किसी भी सामूहिकता की शुरुआत एक इकाई से प्रारम्भ होती है, इकाई के ठीक रहने से सामूहिक ढांचा भी ठीक रहता है। वैयक्तिक अनुशासन में मानसिक, वाचिक व शारीरिक को लिया जा सकता है। मानव जितने भी बाह्य कार्य करता है उसकी पृष्ठभूमि पहले वैचारिक रूप से मन में उद्भूत होती है, इसलिये सभी विचारक व्यक्ति को मन, वचन व कर्म से एक रूप होने का निर्देश करते हैं। यदि मन में उठाये गये विचारों के अनुसार कथनी नहीं है और कहे गये के अनुसार कर्म नहीं है तो निश्चय ही यह मानसिक अनुशासनहीनता कहलायेगी। यह मानसिक असन्तुलन व्यक्ति को तनावग्रस्त व अवसाद का शिकार बना डालते हैं। अतः मनसा, वाचा, कर्मणा एक होने के लिए यत्नशील होना चाहिए। वे विचार जो हमारी प्रगति में बाधक हैं उन विचारों को रोकने का प्रयत्न किया जाना चाहिए। इसके लिए सर्वप्रथम अपने आत्मस्वरूप व मन को दो भिन्न वस्तु के रूप में जानना व मानना आवश्यक है। जब तक इन दोनों की भिन्नता को नहीं जानेंगे व मानेंगे तब तक हम विचारों पर नियन्त्रण करने में अक्षम रहेंगे। किसी भी प्रकार के विचारों को मैं आत्मा ही उठाता हूं, मन तो मेरे वश में है मैं चाहूं तो आवश्यक विचारों को ही उठाऊँगा व अनावश्यक, हानिकारक व तनाव व अवसाद उत्पन्न करने वाले विचारों को रोक देने में समर्थ रहूंगा तो निश्चय जानिये की निरन्तर अभ्यास से हम इस मानसिक अनुशासन की स्थिति को प्राप्त कर लेंगे। मानसिक अनुशासन में सिद्ध व्यक्ति अपने आन्तरिक द्वन्द्वों को देख व रोक पाने में समर्थ हो जाता है। महाभारत के युद्ध से पूर्व श्रीकृष्ण-अर्जुन के संवाद में अर्जुन द्वारा पूछे गये मन की चंचलता व इसको रोकने के उपाय के रूप में श्रीकृष्ण जी ने इस मानसिक असन्तुलन को सन्तुलित करने के दो उपाय बताये हैं, अभ्यास और वैराग्य। ‘योग दर्शन के अनुसार ‘तत्रस्थितौ यत्नोभ्यासः’ अर्थात् जिस विचार से हम बचना चाहते हैं उसे विवेक पूर्वक रोकने लिए बार-बार पुनरावृत्ति करें जिससे वह हमारा स्वभाव बन जाए, साथ ही ‘दृष्टानुश्रविक विषयवितृष्णस्य वशीकार संज्ञा वैराग्यम्’ देखे और सुने गये विषय-वासनाओं से अपने आप को रोकना वैराग्य है। इन दोनों से मानसिक स्वास्थ्य ठीक रहेगा व कार्यों के करने में हमारी क्षमता का विकास होगा।

वाचिक अनुशासन जीवन को अनुशासित करने की कारगर औषधी है। किसी शस्त्र से किया गया घाव समय के अनुसार भर सकता है, लेकिन वाणी द्वारा किया गया घाव कभी नहीं भरता। वाणी के दुष्ट प्रयोग से हुए बहुत सारे ऐतिहासिक युद्ध प्रकरणों को इतिहास ग्रन्थों में पढ़ा व जाना जा सकता है। किसी कवि का कथन भी है ‘‘बोल का मोल अमोल है, बोल सके तो बोल। पहले भीतर तोल कर फिर मुख बाहर खोल’’ अनावश्यक व अधिक बोलने से शरीर की ऊर्जा का व्यर्थ में व्यय होता है। आवश्यकता होने पर ही बोलना व अपनी वाणी पर पूर्ण नियन्त्रण रखना वाचिक अनुशासन कहलाता है। वेद में लिखा हैः- वाचा वदामि मधुमत्- वाणी से मधुर ही बोलें। वाणी का प्रयोग इस प्रकार से किया जाये की वह हृदय में घाव नहीं अपितु सोहार्दता को उत्पन्न करने वाली हो। अनुशासित व संस्कारित वाणी मानव-जीवन को उन्नत करने का श्रेष्ठ सोपान है। नीतिकार भर्तृहरि ने लिखा है ‘वाण्येका संमलंकरोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते’ अर्थात् संस्कारित वाणी का प्रयोग व्यक्ति के आभूषण के रूप में समझी जा सकती है।

शारीरिक अनुशासन हमारी बाह्य इन्द्रियों के नियन्त्रण व रोग-निवारण से सम्बन्ध रखता है। अधिकांश रोगों को हम अपनी शरीर के प्रति की गई अनवधानता के कारण आमन्त्रित करते हैं। आहार, निद्रा व ब्रह्मचर्य स्वस्थ रहने के तीन आधार स्तम्भ माने गये हैं इन तीनों के सन्तुलन व अनुशासन से हम अपने शरीर को दीर्घकाल तक नीरोग रख सकते हैं। वर्तमान में बहुत सारी खोजों से यह पाया गया है कि हम इस प्रकार के आहारों का सेवन कर रहें हैं जो हमारे शरीर को विभिन्न रोगों से ग्रस्त कर रहा है, वैद्यक शास्त्र के नियम अनुसार लिया गया खाद्य निश्चय ही हमारे शरीर को रोगग्रस्त होने से बचायेगा। नित्यप्रति योग-प्राणायाम, प्रातः भ्रमण व उचित व्यायाम से इन्द्रियां सबल रहेंगी जिससे शारीरिक तन्त्र भली-भांति क्रियाशील रहेगा। सुश्रुत-संहिता में शारीरिक स्वास्थ्य के लिए ‘प्रातःकाले व्यायामः नित्यं दन्तविशोधनं’ लिखकर व्यायाम की महत्ता को प्रदर्शित किया है। शरीर को शुद्ध रखने के लिए तीसरा आधार ब्रह्मचर्य बतलाया है- अर्थात् भोगों का सन्तुलित उपभोग ‘अति सर्वत्र वर्जयेत्’ किसी भी भोग का अतिसेवन निश्चय ही शारीरिक सन्तुलन को बिगाड़ सकता है। अतः शारीरिक अनुशासन से हम अपने शरीर को स्वस्थ व दीर्घायुष्य कर सकते हैं।

पारिवारिक अनुशासन से अभिप्राय है परिवार में रह रहे सभी परिजनों का यथायोग्य सत्कार करना। प्रायः एकाकी रहने की हमारी मजबूरियां भारतीय संयुक्त परिवार की परम्परा को नष्टप्रायः कर रही हैं। छोटा परिवार भी सुख का आधार तभी बन पायेगा जब उसमें एक दूसरे के हितों का ध्यान रखा जाये। परस्पर सहयोग की भावना से एक दूसरे को बढ़ाते हुए चलने से हमारा पारिवारिक आधार दृढ़ होगा। वेद मंे पारिवारिक अनुशासन बनाने के लिए बहुत सुन्दर वर्णन मिलता है ‘मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन् मा स्वसारमुत स्वसा’ भाई-भाई से व बहन-बहन से द्वेष न करे क्योंकि द्वेष की अग्नि व्यक्ति को आन्तरिक रूप से कमजोर करती है, वेद में पिता-पुत्र, माता-पुत्र व पति-पत्नी को अनुशासित रहने के लिए इस प्रकार का निर्देश दिया हैः- ‘अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रा भवतु संमना। जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शांतिवाम्।। अर्थात् पुत्र पिता की आज्ञाओं का अनुव्रती व माता के साथ समान मनवाला होवे। पति-पत्नी परस्पर शान्ति प्रदान करने वाले वचनों का उच्चारण करें। इस प्रकार के गृह का अनुशासन एक दूसरे पर आश्रित है। जिस प्रकार से सामूहिक क्रीड़ाओं के खिलाड़ी परस्पर एक-दूसरे के सहयोग व पूर्ण समर्पण-भाव से विजय प्राप्त करते हैं उसी प्रकार से परिवार के संयुक्त अनुशासन से प्रसन्नता-पूर्वक जीवन की सफलता को प्राप्त किया जा सकता है। घर बालक को अनुशासन सिखाने की प्रथम पाठशाला है, घर में माता-पिता द्वारा दिये गये संस्कारों व दूसरों के प्रति सिखाये गये व्यवहारों को बालक आचरण में लाता है। वे सभी बातें आजीवन उसके साथ छाया की भांति साथ रहती है, जो भी उसने घर में सीखा है। बालक के अधिकांशतः सभी व्यवहार उसके माता-पिता व गृहजनों द्वारा किये जा रहे व्यवहारों की प्रतिछाया हैं। अतः गृहजनों के द्वारा सावधानी पूर्वक सभी व्यवहार किये जाने चाहिए, तभी वे एक अनुशासित व श्रेष्ठ नागरिक बनाने की ओर अग्रसर हो सकेंगे।

समाज के प्रति अनुशासित होना हमें सामाजिक रूप से मजबूत करता है, आपसी सौहार्द व पारस्परिक सहयोग की भावना, जाति व सम्प्रदायगत विचारों की अपेक्षा मानवीय मूल्यों से युक्त होना, सामाजिक सकारात्मक सांस्कारिक-मूल्यों में आस्था व उनका पालन करना सामाजिक उन्नति में सहयोगी सिद्ध होंगे। 
राष्ट्रीय-अनुशासन से अभिप्राय है राष्ट्र के प्रति प्रति-बद्धता। अनुशासन राष्ट्रीय जीवन में प्राण स्वरूप है। अनुशासनहीन राष्ट्र सेना-विहीन राष्ट्र की तरह होता है। युवाओं की दृष्टि से भारत सभी राष्ट्रों में अग्रणी माना जाता है, अतः युवाओं को और ज्यादा तत्पराता व सावधानी से इस देश को आगे बढ़ाने में पूर्ण सहयोग करना चाहिए। आये दिन बहुत से ऐसे व्यवहार देखने में आते हैं जिनसे देश की सार्वजनिक सम्पत्ति को हमारे लोगों द्वारा ही हानि पहुंचायी जाती है। ये राष्ट्र की हानि नहीं अपितु हमारी स्वयं की हानि है। हम अपनी सभी आवश्यकतायें इसके माध्यम से ही तो पूर्ण करते हैं। हमारे संविधान निर्माताओं ने जो हमारे मूल कर्त्तव्य व मूल-अधिकार प्रदान किये हैं उसी सीमा में रहकर उनका पालन हमारा परम कर्त्तव्य होना चाहिए तभी हम राष्ट्र के प्रति अनुशासित रह पायेंगे। हम सबके परिश्रम व धन की बदौलत यह राष्ट्र नित्यप्रति नये सोपानों को गढ़ रहा है इसको और अधिक समृद्ध व सुदृढ़ बनाने में हम क्या सहयोग कर सकते हैं इस पर चिन्तन होना चाहिए। पर्यावरण-रक्षा के प्रति सजगता, जल को बचाने के उपाय, संसाधनों का उचित प्रयोग ये सभी कार्य हम अनुशासित रहकर ही कर सकते हैं।

विद्यार्थी जो आधार है राष्ट्र का, भावी जीवन की उन्नति का लेख इसी जीवन-काल में लिखा जाता है। चार आश्रमों में ब्रह्मचर्य आश्रम को प्रथम व महत्त्वपूर्ण माना जाता है। आचार्य छात्र को अनुशिष्ट करने के लिए अपने हृदय में उसको धारण करता है, नई पीढ़ी जो जागरुक है अपने अधिकारों के प्रति उसे अधिकारों के साथ ही कर्त्तव्यों के निर्वहन के लिए तैयार होना चाहिए। अच्छी शिक्षा विद्यार्थी में अनुशासन का संचार करती है। विद्याथिर्यों को अपने सहपाठियों, अध्यापकों, विद्यालय के प्रति सहज अनुशासित होना चाहिए। अनुशासन में रहकर छात्र अपने आचार्य व विद्यालयीय वातावरण से अधिकतम ग्रहण कर सकता है। ‘सुखार्थिनः कुतो विद्या, नास्ति विद्यार्थिनः सुखम्’ विद्यार्थी-काल सुख के लिए नहीं अपितु शिक्षा प्राप्ति में आने वाले कष्टों को सहन करते हुए शिक्षा ग्रहण करना चाहिए क्योंकि सुख चाहने वाले को शिक्षा नहीं आती व विद्या चाहने वाले को प्रारम्भिक कष्टों को तो सहन करना ही होगा। विद्यार्थियों को अधिकतम ज्ञान प्राप्ति के लिए समय-प्रबन्धन अर्थात् आदर्श दिनचर्या बनाकर उसकी अनुपालना करनी चाहिए जो कम समय में अधिक उपलब्धि प्राप्त करने में सहायक सिद्ध होगी। प्रातः जागरण, बड़ों को अभिवादन, स्वच्छता, व्यायाम, योग-प्राणायाम, ध्यान, पौष्टिक आहार, विद्यालय में सजग होकर पाठ श्रवण व गृहकार्य समय पर पूर्ण करना आदि अपनी दिनचर्या को समय के अनुसार बनाकर अनुशासित जीवन से अपने को श्रेष्ठ बनाने में सफल हो पायेंगे। सकारात्मक-चिन्तन ‘यदि मैं चाहूं तो विश्व को कोई शक्ति मुझे आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती, और मैं न चाहूं तो विश्व की कोई शक्ति मुझे आगे नहीं बढ़ा सकती। सकारात्मक चिन्तन जीवन को अनुशासित करने में अत्यन्त सहायक सिद्ध होगा।

अतः हम कह सकते हैं कि अनुशासन सामाजिक सन्तुलन को बनाये रखने के लिए अत्यावश्यक कारक है। अनुशासन के बिना श्रेष्ठ समाज की कल्पना ही नहीं की जा सकती, वर्तमान की बढ़ती हुई प्रतिस्पर्धात्मक जीवन शैली में अनुशासित व्यक्ति सफलता को शीघ्रता से प्राप्त कर सकता है। अनुशासन विकासपथ है, जिस पर चलकर सम्भावित उद्देश्यों को पूर्ण किया जा सकता है। अनुशासन हमारे द्वारा निर्धारित लक्ष्यों व उसकी उपलब्धि के बीच में सेतु का कार्य करता है। यह अनुशासन रूपी सेतु जितना दृढ़ होगा उतनी ही शीघ्रता से हम अपने लक्ष्यों को पा सकते हैं। अनुशासन को व्यक्ति, परिवार, समाज व राष्ट्र की नींव कहा जा सकता है। अनुशासन संस्कृति का मेरुदण्ड है। किसी भी देश की सांस्कृतिक व सांस्कारिक परम्परा को वहां के युवाओं द्वारा किये जा रहे व्यवहारों व क्रियाकलापों से जाना जा सकता है। फूलों का खिलना, फलों का पकना, वर्षा का आना भी प्राकृतिक अनुशासन के ही दायरे में आता है अगर मनुष्य इस प्रकृति का अनुगामी बनकर अनुशासन का पालन करता है तो वास्तव में वह ईश्वर की श्रेष्ठ कृति कहलाने का हकदार है।

बुधवार, 30 नवंबर 2011

बाबा साहेब अम्बेडकर के विचार



आर्य के बारे में बाबा साहेब अम्बेडकर के विचार 



प्रश्न: क्या आप मानते हैं कि  शुद्र  गैर आर्य थे?

डॉ. अम्बेडकर:  नहीं, गहरे अध्ययन के बाद, मैं इस निष्कर्ष में पंहुचा  हु कि 
१.  शुद्र  भी  आर्यों थे, 
२. शुद्र  क्षत्रिय वर्ग के थे  और 
३.   शुद्र  पहले क्षत्रियों का एक वर्ग महत्वपूर्ण से थे और प्राचीन आर्य समुदाय के सबसे प्रतिष्ठित और शक्तिशाली राजा थे. 
क्यू: मैं जानता हूँ कि  आप  पश्चिमी लेखकों के विभिन्न सिद्धांतों से   अच्छी तरह परिचित है  जिसमे वे  char  वर्ण को  गैर आर्यों  के रूप में वर्णन  करते  हैं. आप किसी भी  बिंदु  पर सहमत है, जिससे आपके  सिधांत  और   पश्चिमी लेखकों सिध्हंतो में किसी भी विचार में एकता बन सके. 
डॉ. अम्बेडकर : मै  निम्नलिखित पश्चिमी   सिध्धांतो से सहमत  नहीं   हु: 

1) जो लोग वैदिक साहित्य बनाया आर्य जाति के थे.
2) इस आर्यन नस्ल  भारत के बाहर से आया है और भारत पर आक्रमण किया.
3) भारत के मूल निवासी Dasas और Dasyus जो नस्ली आर्यों से अलग थे के रूप में जाने जाते थे.
4) आर्यों को एक सफेद नस्ल के  थे. Dasas और Dasyus एक काले  नस्ल के  थे.
5) आर्यों ने  Dasas और दस्युस पर  विजय प्राप्त की.
6) Dasas और Dasyus से विजय के बाद उनके  शुद्र  (गुलाम ) बनाया 
7) आर्यों पूर्वाग्रह  से ग्रसित थे  इसलिए वर्ण ब्यस्था  बनायीं  जिससे वे Dasas और Dasyus से अलग हो.और हमेश गुलाम रहे. 


प्रश्न:  इन पश्चिमी सिद्धांतों के आधार  क्या है?

उत्तर : इस सिद्धांतो का  नींव इसमें टिकी हुए है कि आर्य एक जाती है जो यहाँ रहती है.  

प्रश्न यह प्रस्ताव सही है? 
उत्तर : वेदों में कही भी आर्य को एक नस्ल या जाति के रूप में नहीं मिलता है.  एक नस्ल या जाति के कुछ रूप कुछ विशिष्ट लक्षण है जो वंशानुगत रखने के एक शरीर के रूप में परिभाषित किया जा सकता है.
वैदिक साहित्य  के परिशिक्षण  से पता चलता है कि ऋग्वेद  में आर्य शब्द का दो तरह से लिखा गया है, प्रथम  एक लंबे A के साथ  आर्य और द्वितीय   एक छोटी A के साथ आर्य  होते है.
 ऋग्वेद  में एक छोटी A शब्द का आर्य  88 स्थानों में प्रयोग किया गया  है. उअर शब्द के चार अलग अलग प्रकार से प्रयोग किया गया  है, 

(1) दुश्मन के रूप में, (2) सम्मानजनक व्यक्ति (3) भारत देश का  नाम और (4) मालिक वैश्य, या नागरिक. 
ऋग्वेद  में एक लब्बा  A शब्द का आर्य  31स्थानों में प्रयोग किया गया  है. लेकिन इनमें से कोई भी जाति या नस्ल  के अर्थ के रूप में प्रयोग नहीं किया गया है.  
वेदों से एक निर्विवाद निष्कर्ष  निकालता है , जो इस प्रकार है कि आर्य और आर्य शब्द जो वेदों में है इसका कही भी  नस्लीय भावना  में प्रयोग  नहीं किया गया है. 
अब  प्रो मैक्स म्यूएलर क्या इस विषय पर कहते हैं: 
रक्त  से कोई भी आर्यन नस्ल  या जाति नहीं  है. वैज्ञानिक भाषा में आर्यन पूरी तरह से एक विचार है , जो आर्यन को पूरी तरह एक नस्ल या जाति से इनकार करता है. 
आर्यन नस्ल  थ्योरी बिलकुल  बेतुका और मृतप्राय है. और पहले ही अमान्य कर देना चाहिए था. 


प्रश्न : कहाँ से तथाकथित आर्यन नस्ल  भारत में आया था? आर्यन नस्ल का  मूल घर कहा  था? क्या आर्य भारत में आक्रमण किये थे ? 
uttar: वैदिक साहित्य  के परिशिक्षण  से पता चलता कि आर्यों का भारत में  किसी भी आक्रमण  कोई सबूत नहीं है. और न ही ये पता चलता है कि  द्रविड़ , दस, नाग भारत के मूल निवासी है.  और इनसे अर्यो ने  विजय प्राप्त कि है. वेदों में कही भी ये  सबूत नहीं मिलता कि आर्यों, द्रविड़, नाग, दस के बिच कोई  नस्लीय भेद था है. और नहीं कही ये मिलता है कि आर्यों और  Dasas और Dasyus से रंग में अलग थे. वेदों के अनुसार सभी भारत के मूल निवासी थे. और रंगों से कोई अलग नहीं थे.  
पश्शिम सिध्धांत कहता है कि आर्य   गोरे थे जबकि वैदिक साहित्य के अनुसार ये सिद्ध नहीं होता है  उद्धरण के लिए, राम, कृष्ण, Dirghatamas, कण्व आदि रंग में काले  के रूप में वर्णित किया गया है. 

दावा है करते है कि आर्य बाहर से आए और अर्यो ने भारत पर आक्रमण किया इसका आधारसाबित करते है  है कि Dasas और Dasyus भारत के आदिवासी जनजातियों हैं पूरी तरह से झूठी और बेबुनियाद है.  
''आक्रमण का  सिद्धांत'' एक मनगढ़ंत कहानी है. 
आक्रमण के सिद्धांत एक  काल्पनिक धरना है.  कि आर्य नस्ल का मूल   शुद्धतम  प्रतिनिधि   Indo-Germanic people रहे हैं  जो वर्तमान में भी शुद्ध वजह से आवश्यक है मानते है . यह  सिद्धांत ऐसी मान्यताओं पर आधारित जो baseless है जो कि कल्पना और inferences पर आधारित है. सिद्धांत वैज्ञानिक जांच की एक विकृति है.जो कि बाहार  के तथ्यों का  अनुमति नहीं  देता है. यह सिद्धांत पूर्वाग्रह से ग्रसित  है जो तध्य लिया गया वह भारत के बहार से लिया जो कि अमान्य है.   पश्चिमी सिद्धांत भारत के सबसे पुराने ग्रन्थ ऋग्वेद को नहीं मानता है जोकि हमारे लिए   सबसे बड़ा  और अच्छा सबूत है. जो सिद्धांत हमारे वेदों से भिन्न है वह सब अमान्य है. और उसे हमें अस्वीकार किया जाना चाहिए. इसलिए विदेशो द्वारा  मानी गई ''आक्रमण का  सिद्धांत'' झूटी है. 

क्यू: क्या कोई हिन्दू  विद्वानों ने इस पश्चिमी सिद्धांत का समर्थन करते है ? 
एक: हा इस पश्चिमी सिद्धांत के कुछ ब्राह्मण विद्वानों से समर्थन प्राप्त हुआ है. यह एक बहुत ही अजीब घटना है.  हिंदुओं   ही अपने आप को  वे आमतौर पर एशियाई दौड़ से अधिक यूरोपीय दौड़ की श्रेष्ठता के अपने व्यक्त  आप ब्यक्त करके स्वीकार  कर रहे है. और हमारे  ''आर्य सिद्धांत '' को खुद ही  एक नापसंद कर रहे , ब्राह्मण अपने लोगो से नफरत कर रहे है. जैसे ये गुलाम है. और अपने आप को आर्य बाकि  हिन्दुयो को दास मानने लगे. और  पश्चिम सिध्धांत को मनाने लगे  है.  जैसे अपने आप कोई एक नस्ल के रूप में प्रदर्शित  कर रहे है. लेकिन वह सबसे स्वेच्छा से यह निवासी है. यह हम्मारी वैदिक सिध्धांत के अनुसार गलत है. भारत के हर जाति और  नस्ल  के लोग पहले आर्य थे और अभी भी एक है. 
क्यू: लोकमान्य तिलक के सुझाव के बारे में अपनी राय है कि आर्यन दौड़ के मूल घर आर्कटिक क्षेत्र में था,  क्या यह सत्य है? 

उत्तर : नहीं , ये गलत है . हमारे मूल वैदिक ग्रंथो एक बिदु अधिक देखा गया है कि  घोड़े वैदिक आर्यों की एक पसंदीदा जानवर था. जो कि आर्यों का सबसे उपयोगी और धार्मिक रूप से भी  साथ जुड़ा था. सवाल यह है: आर्कटिक क्षेत्र में क्या पाया घोड़ा था? अगर जवाब नकारात्मक है, आर्कटिक होम सिद्धांत बहुत अनिश्चित हो जाता है, 
अब तक  वैदिक साहित्य से अनुसार , यह सिद्धांत है कि आर्यों का मूल भारत से बाहर था अदि आर्य बाहर से थे तो फिर कभी कोई विदेशी मेरा गंगा, मेरे यमुना, मेरी सरस्वती, जैसे परिचित और प्यारी शब्दों का प्रयोग क्यों करेगा.  सात नदियों के  संदर्भ ऋग्वेद (75.5 एक्स) में बारबार प्रयोग किया गया है. जिससे अपने देशप्रेम कि भावना उत्त्पन होती  है. और कोई विदेशी ऐसा शब्दों का प्रयोग नहीं कर सकता है. 
रिग वेद से इस तरह के विचार ये  जाहिर है होता है. Dasas और Dasyus की गैर आर्यन नस्ल  का  आर्यन नस्ल  के साथ  एक सैन्य विजय के एक सिद्धांत सिद्ध नहीं होता है. 
 श्री पी.टी. श्रीनिवास आयंगर के अनुसार :  
सावधानी  पूर्वक   वैदिक मंत्रो का निरिक्षण  करने और जहा पर  आर्य, Dasas और Dasyus शब्दों का प्रयोग हुआ उससे पता चलता है  इन मंत्रो में कही भी   किसी नस्ल या पंथ कि तरफ इंगित  नहीं करता  है. ये शब्द ऋग्वेद संहिता पूरे पर १,५३,९७२ शब्दों वाले मंत्र में 33 बार आर्य शब्द का प्रयोग हुआ है.  यह दुर्लभ घटना अपने आप में एक सबूत है कि जनजाति   खुद Aryas कहा है.  जो खुद ही अपने देश में अकर्मण कैसे कर सकते है. 

चौथा वर्ना 
प्रश्न: यदि यूरोपीय विद्वानों के सिद्धांत गलत  हैं, तो फिर एक चौथा पीड़ित वर्ना के उद्भव कैसे हुए? 
उत्तर : पूरी स्थिति को संक्षेप में कहा जा सकता है जो कि  निम्नानुसार है: 
1) जो आज Shudras है वे  सुरु से  आर्य समुदाय के थे. 
2) आज के Shudras इंडो - आर्यन समाज में क्षत्रिय वर्ना के रूप में स्थान पर रहीं. 
3) एक बार जब आर्यन सोसायटी केवल तीन वर्णों, अर्थात्, ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्य को मान्यता दी थी. Shudras एक अलग वर्ण नहीं था लेकिन क्षत्रिय वर्ना का एक हिस्सा भी  थे. शुद्र वही बनता था जो आर्य विचार को नहीं मानता था. लेकिन बाद में एक लग वर्ण बन गया. 
4) और बाद में शूद्र किंग्स और ब्राह्मणों के बीच में नफरत कायम हो गई.
5) ब्राम्हणों के  क्रूरता और oppressions के कारण शुद्र शुद्र ही बने रहे और ब्रह्मण सिर्फ ब्रम्हां ,  ब्राह्मणों  ने शुद्रो को पवित्र धागा   जिसे जनेऊ कहते है  उसे प्रयोग के लिया मन कर दिया जोकि सभी अर्यो के लिए आवश्यक  था.  
6) पवित्र धागा न प्रयोग करने से Shudras सामाजिक अपमानित हो गया और आर्यों से अलग गिनती होने लगी. अब  आर्यों में  वैश्य के रैंक से नीचे गिर गया और 4tha वर्ण के रूप में शुद्र हो गए . 
क्यू:  पांचवें वर्ना की उत्पत्ति के बारे में  आपका क्या विचार है जिसे अछूत कहा जाता है.? 
  उत्तर वैदिक काल में कोई अस्पृश्यता नहीं था.  सभी अपने धर्म सूत्र के अनुसार नियमो का पालम करते थे. कोई जन्म से कोई श्रेष्ट और को निम्न  नहीं था. 
मनु स्मृति में कोई पांचवें वर्ण  है. परन्तु मनु के समय में अस्पृश्यता नहीं था. हम निश्चित रूप से कहना है कि मनु स्मृति अस्पृश्यता का हुक्म देना नहीं था. मनु स्मृति पुस्पमित्र के समय मिलावट  किया गया है. 
जबकि अस्पृश्यता 200 ई. में मौजूद भी  नहीं   था, यह 600 ई. से उभरा था.  

डॉ.  भंडारकर के अनुसार, गाय की हत्या गुप्ता राजाओं द्वारा 4 शताब्दी ई. के आसपास  अपराध  घोषित किया गया था, इसलिए कुछ विश्वास के साथ कह सकते  है कि अस्पृश्यता 400 ई. बाद ही शुरू हुआ है  

क्यू:  क्या एकमात्र कारन है कि  बौद्ध धर्म और Brahminism के बीच नफरत  और युध्ध  के कारन हारे हुए लोग (गुलाम पुरुर्ष)  अछूत  बन गए. 
उत्तर : यही सत्य है. यह ब्राह्मणों ने  बौद्धों के खिलाफ खिलाफ युद्ध किया और उन्हें गुलाम बनाया गया.  
प्रश्न: क्या हम कह सकते हैं कि यही गुलाम  पुरुष बाद में अछूत  बन गए क्योकि वे मज़बूरी में  वे गोमांस  भी खाया? 
 उत्तर: इस सवाल का सकारात्मक जवाब देने में कोई  हिचक नहीं है  इसके सुवे कोई दूसरा उत्तर नहीं है. 
क्यू:  क्या आप मानते है कि अछूत  गैर आर्यन नस्ल से  हैं? 
उत्तर : जैसा कि मैंने पहले कहा है कि , इतिहासकारों  ने गलती कि है 

कि जो आर्यों को एक नस्ल मन है. जोकि पूरी तरह से गलत है.  इस संबंध में, महाभारत के शांति पर्वके 65 Adhyaya के 23 पद्य संदर्भ बनाया जा सकता है. मंत्र  का कहना है: सभी वर्णों में और पूरे Ashramas में एक Dasyus के अस्तित्व पाता. यह इंगित करता है कि शब्द Dasyus एक गैर आर्यन के लिए इस्तेमाल नहीं किया है. 
यदि anthropometry एक विज्ञान है जिस पर निर्भर हो सकता है लोगों की दौड़ निर्धारित है, तो anthropometry के हिंदू समाज के विभिन्न तबको को अलग नस्ल के रूप में बताता हा इसका मै खंडन करता हु. कि अछूत आर्य और द्रविड़ से एक अलग नस्ल हैं. मेराहै कि ब्राह्मण और अछूत एक ही जाति के हैं. यदि ब्राह्मण आर्य कर रहे हैं, अछूत भी आर्य है.यदि ब्राह्मण द्रविड़ हैं, अछूत भी द्रविड़. नस्लीय अस्पृश्यता का सिद्धांत ऐसे तथ्यों के रूप में हम भारत के ethnology के बारे में पता से बहुत कम समर्थन पाता है. नस्लीय अस्पृश्यता के मूल के सिद्धांत इसलिए -23-7-1962 ke baad  परित्यक्त होना चाहिए 

(DB Thengadi, साहित्य सिंधु. प्रकाशन द्वारा परिप्रेक्ष्य)

रविवार, 27 नवंबर 2011

एक लेख सिर्फ सच्चे भारतीयों के लिये


एक लेख सिर्फ सच्चे भारतीयों के लिये

यदि आपके पास समय नहीं है तो कृपया इस लेख को पढऩे कीशुरूआत ही मत कीजिए। यह लेख आपके अपने भारत की व्यवस्था सेजुड़ा है और बहुत ही गंभीर विषय है। यदि आपके पास समय है तोकृपया पढि़ए क्या कुछ उजागर कर रहे हैं हम ..

साथियों , व्यवस्था परिवर्तन क्यो जरूरी है ? आजादी के 64 साल बाद भी देश मे सारे वही कानून अभी तक है, जो अन्ग्रेजों ने हमें लूटने कि लिये बनाये थे ।

(01) 1857 में एक क्रांति हुई जिसमे इस देश में मौजूद 99 % अंग्रेजों को भारत के लोगों ने चुन चुन के मार डाला था |

(02) हमारे देश के इतिहास की किताबों में उस 1857 की क्रांति को सिपाही विद्रोह के नाम से पढाया जाता है | जो बिलकुल गलत है | Mutiny और Revolution में अंतर होता है लेकिन इस क्रांति को विद्रोह के नाम से ही पढाया गया हमारे इतिहास में |

(03) अंग्रेज जब वापस आये तो उन्होंने क्रांति के उद्गम स्थल बिठुर (जो कानपुर के नजदीक है) पहुँच कर सभी 24000 लोगों का मार दिया चाहे वो नवजात हो या मरणासन्न |

(04) 1857 से उन्होंने भारत के लिए ऐसे-ऐसे कानून बनाये जो एक सरकार के शासन करने के लिए जरूरी होता है | आप देखेंगे कि हमारे यहाँ जितने कानून हैं वो सब के सब 1857 से लेकर 1946 तक के हैं |

(05) तो अंग्रेजों ने सबसे पहला कानून बनाया Central Excise Duty Act और टैक्स तय किया गया 350% मतलब 100 रूपये का उत्पादन होगा तो 350 रुपया Excise Duty देना होगा | फिर अंग्रेजों ने समान के बेचने पर Sales Tax लगाया और वो तय किया गया 120% मतलब 100 रुपया का माल बेचो तो 120 रुपया CST दो |

(06) 1840 से लेकर 1947 तक टैक्स लगाकर अंग्रेजों ने जो भारत को लुटा उसके सारे रिकार्ड बताते हैं कि करीब 300 लाख करोड़ रुपया लुटा अंग्रेजों ने इस देश से |

(07) आपने पढ़ा होगा कि हमारे देश में उस समय कई अकाल पड़े, ये अकाल प्राकृतिक नहीं था बल्कि अंग्रेजों के ख़राब कानून से पैदा हुए अकाल थे,

(08) हमारे देश में अंग्रेजों ने 34735 कानून बनाये शासन करने के लिए,

(09) 1858 में Indian Education Act बनाया गया |

(10) मैकोले का स्पष्ट कहना था कि भारत को हमेशा-हमेशा के लिए अगर गुलाम बनाना है तो इसकी देशी और सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से ध्वस्त करना होगा और उसकी जगह अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी और तभी इस देश में शरीर से हिन्दुस्तानी लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे |

(11) मैकोले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी वो, उसमे वो लिखता है कि "इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे और इन्हें अपने देश के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने मुहावरे नहीं मालूम होंगे, जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी "

(12) लोगों का तर्क है कि अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है, दुनिया में 204 देश हैं और अंग्रेजी सिर्फ 11 देशों में बोली, पढ़ी और समझी जाती है, फिर ये कैसे अंतर्राष्ट्रीय भाषा है |

(13) 1860 में इंडियन पुलिस एक्ट बनाया गया | 1857 के पहले अंग्रेजों की कोई पुलिस नहीं थी| और वही दमन और अत्याचार वाला कानून "इंडियन पुलिस एक्ट" आज भी इस देश में बिना फुल स्टॉप और कौमा बदले चल रहा है | और बेचारे पुलिस की हालत देखिये कि ये 24 घंटे के कर्मचारी हैं उतने ही तनख्वाह में| तनख्वाह मिलती है 8 घंटे की और ड्यूटी रहती है 24 घंटे की |

(14) और जेल के कैदियों को अल्युमिनियम के बर्तन में खाना दिया जाता था ताकि वो जल्दी मरे, वो अल्युमिनियम के बर्तन में खाना देना आज भी जारी हैं हमारे जेलों में, क्योंकि वो अंग्रेजों के इस कानून में है |

(15) 1860 में ही इंडियन सिविल सर्विसेस एक्ट बनाया गया | ये जो Collector हैं वो इसी कानून की देन हैं | ये जो Collector होते थे उनका काम था Revenue, Tax, लगान और लुट के माल को Collect करना इसीलिए ये Collector कहलाये | अब इस कानून का नाम Indian Civil Services Act से बदल कर Indian Civil Administrative Act हो गया है, 64 सालों में बस इतना ही बदलाव हुआ है |

(16) *Indian Income Tax Act -* तो ध्यान दीजिये कि इस देश में टैक्स का कानून क्यों लाया जा रहा है ? क्योंकि इस देश के व्यापारियों को, पूंजीपतियों को, उत्पादकों को, उद्योगपतियों को, काम करने वालों को या तो बेईमान बनाया जाये या फिर बर्बाद कर दिया जाये, ईमानदारी से काम करें तो ख़त्म हो जाएँ और अगर बेईमानी करें तो हमेशा ब्रिटिश सरकार के अधीन रहें | अंग्रेजों ने इनकम टैक्स की दर रखी थी 97% और इस व्यवस्था को 1947 में ख़त्म हो जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ और आपको जान के ये आश्चर्य होगा कि 1970-71 तक इस देश में इनकम टैक्स की दर 97% ही हुआ करती थी |

(17) अंग्रेजों ने तो 23 प्रकार के टैक्स लगाये थे उस समय इस देश को लुटने के लिए, अब तो इस देश में VAT को मिला के 64 प्रकार के टैक्स हो गए हैं |

(18) 1865 में Indian Forest Act बनाया गया और ये लागू हुआ 1872 में | इस कानून के बनने के पहले जंगल गाँव की सम्पति माने जाते थे|

(19) इस कानून में ये प्रावधान किया कि भारत का कोई भी आदिवासी या दूसरा कोई भी नागरिक पेड़ नहीं काट सकता | लेकिन दूसरी तरफ जंगलों के लकड़ी की कटाई के लिए ठेकेदारी प्रथा लागू की गयी जो आज भी लागू है और कोई ठेकेदार जंगल के जंगल साफ़ कर दे तो कोई फर्क नहीं पड़ता | ये इंडियन फोरेस्ट एक्ट ऐसा है जिसमे सरकार के द्वारा अधिकृत ठेकेदार तो पेड़ काट सकते हैं लेकिन आप और हम चूल्हा जलाने के लिए, रोटी बनाने के लिए लकड़ी नहीं ले सकते और उससे भी ज्यादा ख़राब स्थिति अब हो गयी है, आप अपने जमीन पर के पेड़ भी नहीं काट सकते |

(20 ) *Indian Penal Code *- अंग्रेजों ने एक कानून हमारे देश में लागू किया था जिसका नाम है Indian Penal Code (IPC ) | ड्राफ्टिंग करते समय मैकोले ने एक पत्र भेजा था ब्रिटिश संसद को जिसमे उसने लिखा था कि "मैंने भारत की न्याय व्यवस्था को आधार देने के लिए एक ऐसा कानून बना दिया है जिसके लागू होने पर भारत के किसी आदमी को न्याय नहीं मिल पायेगा | इस कानून की जटिलताएं इतनी है कि भारत का साधारण आदमी तो इसे समझ ही नहीं सकेगा और जिन भारतीयों के लिए ये कानून बनाया गया है उन्हें ही ये सबसे ज्यादा तकलीफ देगी |

(21) ये हमारी न्याय व्यवस्था अंग्रेजों के इसी IPC के आधार पर चल रही है | और आजादी के 64 साल बाद हमारी न्याय व्यवस्था का हाल देखिये कि लगभग 4 करोड़ मुक़दमे अलग-अलग अदालतों में पेंडिंग हैं, उनके फैसले नहीं हो पा रहे हैं | 10 करोड़ से ज्यादा लोग न्याय के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं लेकिन न्याय मिलने की दूर-दूर तक सम्भावना नजर नहीं आ रही है, कारण क्या है ? कारण यही IPC है | IPC का आधार ही ऐसा है |

(22) *L*** Acquisition Act -* एक अंग्रेज आया इस देश में उसका नाम था डलहौजी | डलहौजी ने इस "जमीन को हड़पने के कानून" को भारत में लागू करवाया, इस कानून को लागू कर के किसानों से जमीने छिनी गयी | गाँव गाँव जाता था और अदालतें लगवाता था और लोगों से जमीन के कागज मांगता था" | और आप जानते हैं कि हमारे यहाँ किसी के पास उस समय जमीन के कागज नहीं होते थे| एक दिन में पच्चीस-पच्चीस हजार किसानों से जमीनें छिनी गयी | डलहौजी ने आकर इस देश के 20 करोड़ किसानों को भूमिहीन बना दिया और वो जमीने अंग्रेजी सरकार की हो गयीं | 1947 की आजादी के बाद ये कानून ख़त्म होना चाहिए था लेकिन नहीं, इस देश में ये कानून आज भी चल रहा है | आज भी इस देश में किसानों की जमीन छिनी जा रही है बस अंतर इतना ही है कि पहले जो काम अंग्रेज सरकार करती थी वो काम आज भारत सरकार करती है | पहले जमीन छीन कर अंग्रेजों के अधिकारी अंग्रेज सरकार को वो जमीनें भेंट करते थे, अब भारत सरकार वो जमीनें छिनकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भेंट कर रही है | 1894 का ये अंग्रेजों का कानून बिना किसी परेशानी के इस देश में आज भी चल रहा है | इसी देश में नंदीग्राम होते हैं, इसी देश में सिंगुर होते हैं और अब नोएडा हो रहा है | जहाँ लोग नहीं चाहते कि हम हमारी जमीन छोड़े, वहां लाठियां चलती हैं, गोलियां चलती है |

(23) अंग्रेजों ने एक कानून लाया था Indian Citizenship Act, कानून में ऐसा प्रावधान है कि कोई व्यक्ति (पुरुष या महिला) एक खास अवधि तक इस देश में रह ले तो उसे भारत की नागरिकता मिल सकती है (जैसे बंगलादेशी शरणार्थी) | दुनिया में 204 देश हैं लेकिन दो-तीन देश को छोड़ के हर देश में ये कानून है कि आप जब तक उस देश में पैदा नहीं हुए तब तक आप किसी संवैधानिक पद पर नहीं बैठ सकते, लेकिन भारत में ऐसा नहीं है| ये अंग्रेजों के समय का कानून है, हम उसी को चला रहे हैं, उसी को ढो रहे हैं आज भी, आजादी के 64 साल बाद भी |

(24) *Indian Advocates Act - हमारे यहाँ वकीलों का जो ड्रेस कोड है वो इसी कानून के आधार पर है, काला कोट, उजला शर्ट और बो ये हैं वकीलों का ड्रेस कोड | इंग्लैंड में चुकी साल में 8-9 महीने भयंकर ठण्ड पड़ती है तो उन्होंने ऐसा ड्रेस अपनाया| हमारे यहाँ का मौसम गर्म है और साल में नौ महीने तो बहुत गर्मी रहती है और अप्रैल से अगस्त तक तो तापमान 40-50 डिग्री तक हो जाता है फिर ऐसे ड्रेस को पहनने से क्या फायदा जो शरीर को कष्ट दे,| लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक हमेशा मराठी पगड़ी पहन कर अदालत में बहस करते थे और गाँधी जी ने कभी काला कोट नहीं पहना|

(25 ) *Indian Motor Vehicle Act -* उस ज़माने में कार/मोटर जो था वो सिर्फ अंग्रेजों, रजवाड़ों और पैसे वालों के पास होता था तो इस कानून में प्रावधान डाला गया कि अगर किसी को मोटर से धक्का लगे या धक्के से मौत हो जाये तो सजा नहीं होनी चाहिए या हो भी तो कम से कम | सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस देश में हर साल डेढ़ लाख लोग गाड़ियों के धक्के से या उसके नीचे आ के मरते हैं लेकिन आज तक किसी को फाँसी या आजीवन कारावास नहीं हुआ |

(26) *Indian Agricultural Price Commission Act -* ये भी अंग्रेजों के ज़माने का कानून है | पहले ये होता था कि किसान, जो फसल उगाते थे तो उनको ले के मंडियों में बेचने जाते थे और अपने लागत के हिसाब से उसका दाम तय करते थे | आप हर साल समाचारों में सुनते होंगे कि "सरकार ने गेंहू का,धान का, खरीफ का, रबी का समर्थन मूल्य तय किया" | उनका मूल्य तय करना सरकार के हाथ में होता है | और आज दिल्ली के AC Room में बैठ कर वो लोग किसानों के फसलों का दाम तय करते हैं जिन्होंने खेतों में कभी पसीना नहीं बहाया और जो खेतों में पसीना बहाते हैं, वो अपने उत्पाद का दाम नहीं तय कर सकते |

(27) *Indian Patent Act - * अंग्रेजों ने एक कानून लाया Patent Act , और वो बना था 1911 . ये जा के 1970 में ख़त्म हुआ श्रीमती इंदिरा गाँधी के प्रयासों से लेकिन इसे अब फिर से बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव में बदल दिया गया है | मतलब इस देश के लोगों के हित से ज्यादा जरूरी है बहुराष्ट्रीय कंपनियों का हित |

भारत के कानून !!

भारत में 1857 के पहले ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन हुआ करता था वो अंग्रेजी सरकार का सीधा शासन नहीं था | 1857 में एक क्रांति हुई जिसमे इस देश में मौजूद 99 % अंग्रेजों को भारत के लोगों ने चुन चुन के मार डाला था और 1% इसलिए बच गए क्योंकि उन्होंने अपने को बचाने के लिए अपने शरीर को काला रंग लिया था | लोग इतने गुस्से में थे कि उन्हें जहाँ अंग्रेजों के होने की भनक लगती थी तो वहां पहुँच के वो उन्हें काट डालते थे | हमारे देश के इतिहास की किताबों में उस क्रांति को सिपाही विद्रोह के नाम से पढाया जाता है |

Mutiny और Revolution में अंतर होता है लेकिन इस क्रांति को विद्रोह के नाम से ही पढाया गया हमारे इतिहास में | 1857 की गर्मी में मेरठ से शुरू हुई ये क्रांति जिसे सैनिकों ने शुरू किया था, लेकिन एक आम आदमी का आन्दोलन बन गया और इसकी आग पुरे देश में फैली और 1 सितम्बर तक पूरा देश अंग्रेजों के चंगुल से आजाद हो गया था | भारत अंग्रेजों और अंग्रेजी अत्याचार से पूरी तरह मुक्त हो गया था |

लेकिन नवम्बर 1857 में इस देश के कुछ गद्दार रजवाड़ों ने अंग्रेजों को वापस बुलाया और उन्हें इस देश में पुनर्स्थापित करने में हर तरह से योगदान दिया | धन बल, सैनिक बल, खुफिया जानकारी, जो भी सुविधा हो सकती थी उन्होंने दिया और उन्हें इस देश में पुनर्स्थापित किया | और आप इस देश का दुर्भाग्य देखिये कि वो रजवाड़े आज भी भारत की राजनीति में सक्रिय हैं |

अंग्रेज जब वापस आये तो उन्होंने क्रांति के उद्गम स्थल बिठुर (जो कानपुर के नजदीक है) पहुँच कर सभी 24000 लोगों का मार दिया चाहे वो नवजात हो या मरणासन्न | बिठुर के ही नाना जी पेशवा थे और इस क्रांति की सारी योजना यहीं बनी थी इसलिए अंग्रेजों ने ये बदला लिया था | उसके बाद उन्होंने अपनी सत्ता को भारत में पुनर्स्थापित किया और जैसे एक सरकार के लिए जरूरी होता है वैसे ही उन्होंने कानून बनाना शुरू किया | अंग्रेजों ने कानून तो 1840 से ही बनाना शुरू किया था और मोटे तौर पर उन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर दिया था, लेकिन 1857 से उन्होंने भारत के लिए ऐसे-ऐसे कानून बनाये जो एक सरकार के शासन करने के लिए जरूरी होता है | आप देखेंगे कि हमारे यहाँ जितने कानून हैं वो सब के सब 1857 से लेकर 1946 तक के हैं |

1840 तक का भारत जो था उसका विश्व व्यापार में हिस्सा 33% था, दुनिया के कुल उत्पादन का 43% भारत में पैदा होता था और दुनिया के कुल कमाई में भारत का हिस्सा 27% था | ये अंग्रेजों को बहुत खटकती थी, इसलिए आधिकारिक तौर पर भारत को लुटने के लिए अंग्रेजों ने कुछ कानून बनाये थे और वो कानून अंग्रेजों के संसद में बहस के बाद तैयार हुई थी, उस बहस में ये तय हुआ कि "भारत में होने वाले उत्पादन पर टैक्स लगा दिया जाये क्योंकि सारी दुनिया में सबसे ज्यादा उत्पादन यहीं होता है और ऐसा हम करते हैं तो हमें टैक्स के रूप में बहुत पैसा मिलेगा" |

तो अंग्रेजों ने सबसे पहला कानून बनाया Central Excise Duty Act और टैक्स तय किया गया 350% मतलब 100 रूपये का उत्पादन होगा तो 350 रुपया Excise Duty देना होगा | फिर अंग्रेजों ने समान के बेचने पर Sales Tax लगाया और वो तय किया गया 120% मतलब 100 रुपया का माल बेचो तो 120 रुपया CST दो |

फिर एक और टैक्स आया Income Tax और वो था 97% मतलब 100 रुपया कमाया तो 97 रुपया अंग्रेजों को दे दो | ऐसे ही Road Tax, Toll Tax, Municipal Corporation tax, Octroi, House Tax, Property Tax लगाया और ऐसे करते-करते 23 प्रकार का टैक्स लगाया अंग्रेजों ने और खूब लुटा इस देश को | 1840 से लेकर 1947 तक टैक्स लगाकर अंग्रेजों ने जो भारत को लुटा उसके सारे रिकार्ड बताते हैं कि करीब 300 लाख करोड़ रुपया लुटा अंग्रेजों ने इस देश से | तो भारत की जो गरीबी आयी है वो लुट में से आयी गरीबी है | विश्व व्यापार में जो हमारी हिस्सेदारी उस समय 33% थी वो घटकर 5% रह गयी, हमारे कारखाने बंद हो गए, लोगों ने खेतों में काम करना बंद कर दिया, हमारे मजदूर बेरोजगार हो गए |

इस तरीके से बेरोजगारी पैदा हुई, गरीबी-बेरोजगारी से भुखमरी पैदा हुई और आपने पढ़ा होगा कि हमारे देश में उस समय कई अकाल पड़े, ये अकाल प्राकृतिक नहीं था बल्कि अंग्रेजों के ख़राब कानून से पैदा हुए अकाल थे, और इन कानूनों की वजह से 1840 से लेकर 1947 तक इस देश में साढ़े चार करोड़ लोग भूख से मरे | तो हमारी गरीबी का कारण ऐतिहासिक है कोई प्राकृतिक,अध्यात्मिक या सामाजिक कारण नहीं है | हमारे देश में अंग्रेजों ने 34735 कानून बनाये शासन करने के लिए, सब का जिक्र करना तो मुश्किल है लेकिन कुछ मुख्य कानूनों के बारे में मैं संक्षेप में लिख रहा हूँ |

- *Indian Education Act -* 1858 में Indian Education Act बनाया गया | इसकी ड्राफ्टिंग लोर्ड मैकोले ने की थी | लेकिन उसके पहले उसने यहाँ (भारत) के शिक्षा व्यवस्था का सर्वेक्षण कराया था, उसके पहले भी कई अंग्रेजों ने भारत के शिक्षा व्यवस्था के बारे में अपनी रिपोर्ट दी थी | अंग्रेजों का एक अधिकारी था G.W.Litnar और दूसरा था Thomas Munro, दोनों ने अलग अलग इलाकों का अलग-अलग समय सर्वे किया था | 1823 के आसपास की बात है ये | Litnar , जिसने उत्तर भारत का सर्वे किया था, उसने लिखा है कि यहाँ 97% साक्षरता है और Munro, जिसने दक्षिण भारत का सर्वे किया था, उसने लिखा कि यहाँ तो 100 % साक्षरता है, और उस समय जब भारत में इतनी साक्षरता है | और मैकोले का स्पष्ट कहना था कि भारत को हमेशा-हमेशा के लिए अगर गुलाम बनाना है तो इसकी देशी और सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से ध्वस्त करना होगा और उसकी जगह अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी और तभी इस देश में शरीर से हिन्दुस्तानी लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे और जब इस देश की यूनिवर्सिटी से निकलेंगे तो हमारे हित में काम करेंगे, और मैकोले एक मुहावरा इस्तेमाल कर रहा है "कि जैसे किसी खेत में कोई फसल लगाने के पहले पूरी तरह जोत दिया जाता है वैसे ही इसे जोतना होगा और अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी " |

इसलिए उसने सबसे पहले गुरुकुलों को गैरकानूनी घोषित किया, जब गुरुकुल गैरकानूनी हो गए तो उनको मिलने वाली सहायता जो समाज के तरफ से होती थी वो गैरकानूनी हो गयी, फिर संस्कृत को गैरकानूनी घोषित किया, और इस देश के गुरुकुलों को घूम घूम कर ख़त्म कर दिया उनमे आग लगा दी, उसमे पढ़ाने वाले गुरुओं को उसने मारा-पीटा, जेल में डाला | 1850 तक इस देश में 7 लाख 32 हजार गुरुकुल हुआ करते थे और उस समय इस देश में गाँव थे 7 लाख 50 हजार, मतलब हर गाँव में औसतन एक गुरुकुल और ये जो गुरुकुल होते थे वो सब के सब आज की भाषा में Higher Learning Institute हुआ करते थे उन सबमे 18 विषय पढाया जाता था, और ये गुरुकुल समाज के लोग मिल के चलाते थे न कि राजा, महाराजा, और इन गुरुकुलों में शिक्षा निःशुल्क दी जाती थी | इस तरह से सारे गुरुकुलों को ख़त्म किया गया और फिर अंग्रेजी शिक्षा को कानूनी घोषित किया गया और कलकत्ता में पहला कॉन्वेंट स्कूल खोला गया, उस समय इसे फ्री स्कूल कहा जाता था, इसी कानून के तहत भारत में कलकत्ता यूनिवर्सिटी बनाई गयी, बम्बई यूनिवर्सिटी बनाई गयी, मद्रास यूनिवर्सिटी बनाई गयी और ये तीनों गुलामी के ज़माने के यूनिवर्सिटी आज भी इस देश में हैं | और मैकोले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी बहुत मशहूर चिट्ठी है

वो, उसमे वो लिखता है कि "इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने
में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे और इन्हें अपने देश के बारे
में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा,
इनको अपने परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने मुहावरे नहीं
मालूम होंगे, जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश
से अंग्रेजियत नहीं जाएगी "

और उस समय लिखी चिट्ठी की सच्चाई इस देश में अब साफ़-साफ़ दिखाई दे रही है | और उस एक्ट की महिमा देखिये कि हमें अपनी भाषा बोलने में शर्म आती है, अंग्रेजी में बोलते हैं कि दूसरों पर रोब पड़ेगा, अरे हम तो खुद में हीन हो गए हैं जिसे अपनी भाषा बोलने में शर्म आ रही है, दूसरों पर रोब क्या पड़ेगा | लोगों का तर्क है कि अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है, दुनिया में 204 देश हैं और अंग्रेजी सिर्फ 11 देशों में बोली, पढ़ी और समझी जाती है, फिर ये कैसे अंतर्राष्ट्रीय भाषा है | शब्दों के मामले में भी अंग्रेजी समृद्ध नहीं दरिद्र भाषा है |

इन अंग्रेजों की जो बाइबिल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईशा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे | ईशा मसीह की भाषा और बाइबिल की भाषा अरमेक थी | अरमेक भाषा की लिपि जो थी वो हमारे बंगला भाषा से मिलती जुलती थी, समय के कालचक्र में वो भाषा विलुप्त हो गयी | संयुक्त राष्ट संघ जो अमेरिका में है वहां की भाषा अंग्रेजी नहीं है, वहां का सारा काम फ्रेंच में होता है | जो समाज अपनी मातृभाषा से कट जाता है उसका कभी भला नहीं होता और यही मैकोले की रणनीति थी |

- *Indian Police Act* - 1860 में इंडियन पुलिस एक्ट बनाया गया | 1857 के पहले अंग्रेजों की कोई पुलिस नहीं थी इस देश में लेकिन 1857 में जो विद्रोह हुआ उससे डरकर उन्होंने ये कानून बनाया ताकि ऐसे किसी विद्रोह/क्रांति को दबाया जा सके | अंग्रेजों ने इसे बनाया था भारतीयों का दमन और अत्याचार करने के लिए | उस पुलिस को विशेष अधिकार दिया गया | पुलिस को एक डंडा थमा दिया गया और ये अधिकार दे दिया गया कि अगर कहीं 5 से ज्यादा लोग हों तो वो डंडा चला सकता है यानि लाठी चार्ज कर सकता है और वो भी बिना पूछे और बिना बताये और पुलिस को तो Right to Offence है लेकिन आम आदमी को Right to Defense नहीं है |

आपने अपने बचाव के लिए उसके डंडे को पकड़ा तो भी आपको सजा हो सकती है क्योंकि आपने उसके ड्यूटी को पूरा करने में व्यवधान पहुँचाया है और आप उसका कुछ नहीं कर सकते | इसी कानून का फायदा उठाकर लाला लाजपत राय पर लाठियां चलायी गयी थी और लाला जी की मृत्यु हो गयी थी और लाठी चलाने वाले सांडर्स का क्या हुआ था ? कुछ नहीं, क्योंकि वो अपनी ड्यूटी कर रहा था और जब सांडर्स को कोई सजा नहीं हुई तो लालाजी के मौत का बदला भगत सिंह ने सांडर्स को गोली मारकर लिया था |

और वही दमन और अत्याचार वाला कानून "इंडियन पुलिस एक्ट" आज भी इस देश में बिना फुल स्टॉप और कौमा बदले चल रहा है | और बेचारे पुलिस की हालत देखिये कि ये 24 घंटे के कर्मचारी हैं उतने ही तनख्वाह में, तनख्वाह मिलती है 8 घंटे की और ड्यूटी रहती है 24 घंटे की | और जेल मैनुअल के अनुसार आपको पुरे कपडे उतारने पड़ेंगे आपकी बॉडी मार्क दिखाने के लिए भले ही आपका बॉडी मार्क आपके चेहरे पर क्यों न हो | और जेल के कैदियों को अल्युमिनियम के बर्तन में खाना दिया जाता था ताकि वो जल्दी मरे, वो अल्युमिनियम के बर्तन में खाना देना आज भी जारी हैं हमारे जेलों में, क्योंकि वो अंग्रेजों के इस कानून में है |

*ndian Civil Services Act* - 1860 में ही इंडियन सिविल सर्विसेस एक्ट बनाया गया | ये जो Collector हैं वो इसी कानून की देन हैं | भारत के Civil Servant जो हैं उन्हें Constitutional Protection है, क्योंकि जब ये कानून बना था उस समय सारे ICS अधिकारी अंग्रेज थे और उन्होंने अपने बचाव के लिए ऐसा कानून बनाया था, ऐसा विश्व के किसी देश में नहीं है, और वो कानून चुकी आज भी लागू है इसलिए भारत के IAS अधिकारी सबसे निरंकुश हैं | अभी आपने CVC थोमस का मामला देखा होगा | इनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता | और इन अधिकारियों का हर तीन साल पर तबादला हो जाता था क्योंकि अंग्रेजों को ये डर था कि अगर ज्यादा दिन तक कोई अधिकारी एक जगह रह गया तो उसके स्थानीय लोगों से अच्छे सम्बन्ध हो जायेंगे और वो ड्यूटी उतनी तत्परता से नहीं कर पायेगा या उसके काम काज में ढीलापन आ जायेगा | और वो ट्रान्सफर और पोस्टिंग का सिलसिला आज भी वैसे ही जारी है और हमारे यहाँ के कलक्टरों की जिंदगी इसी में कट जाती है |

और ये जो Collector होते थे उनका काम था Revenue, Tax, लगान और लुट के माल को Collect करना इसीलिए ये Collector कहलाये और जो Commissioner होते थे वो commission पर काम करते थे उनकी कोई तनख्वाह तय नहीं होती थी और वो जो लुटते थे उसी के आधार पर उनका कमीशन होता था | ये मजाक की बात या बनावटी कहानी नहीं है ये सच्चाई है इसलिए ये दोनों पदाधिकारी जम के लूटपाट और अत्याचार मचाते थे उस समय | अब इस कानून का नाम Indian Civil Services Act से बदल कर Indian Civil Administrative Act हो गया है, 64 सालों में बस इतना ही बदलाव हुआ है |

*Indian Income Tax Act -* इस एक्ट पर जब ब्रिटिश संसद में चर्चा हो रही थी तो एक सदस्य ने कहा कि "ये तो बड़ा confusing है, कुछ भी स्पष्ट नहीं हो पा रहा है", तो दुसरे ने कहा कि हाँ इसे जानबूझ कर ऐसा रखा गया है ताकि जब भी भारत के लोगों को कोई दिक्कत हो तो वो हमसे ही संपर्क करें | आज भी भारत के आम आदमी को छोडिये, इनकम टैक्स के वकील भी इसके नियमों को लेकर दुविधा की स्थिति में रहते हैं | और इनकम टैक्स की दर रखी गयी 97% यानि 100 रुपया कमाओ तो 97 रुपया टैक्स में दे दो और उसी समय ब्रिटेन से आने वाले सामानों पर हर तरीके के टैक्स की छुट दी जाती है ताकि ब्रिटेन के माल इस देश के गाँव-गाँव में पहुँच सके | और इसी चर्चा में एक सांसद कहता है कि "हमारे तो दोनों हाथों में लड्डू है, अगर भारत के लोग इतना टैक्स देते हैं तो वो बर्बाद हो जायेंगे या टैक्स की चोरी करते हैं तो बेईमान हो जायेंगे और अगर बेईमान हो गए तो हमारी गुलामी में आ जायेंगे और अगर बरबाद हुए तो हमारी गुलामी में आने ही वाले है" |

तो ध्यान दीजिये कि इस देश में टैक्स का कानून क्यों लाया जा रहा है ? क्योंकि इस देश के व्यापारियों को, पूंजीपतियों को, उत्पादकों को, उद्योगपतियों को, काम करने वालों को या तो बेईमान बनाया जाये या फिर बर्बाद कर दिया जाये, ईमानदारी से काम करें तो ख़त्म हो जाएँ और अगर बेईमानी करें तो हमेशा ब्रिटिश सरकार के अधीन रहें | अंग्रेजों ने इनकम टैक्स की दर रखी थी 97% और इस व्यवस्था को 1947 में ख़त्म हो जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ और आपको जान के ये आश्चर्य होगा कि 1970-71 तक इस देश में इनकम टैक्स की दर 97% ही हुआ करती थी |

और इसी देश में भगवान श्रीराम जब अपने भाई भरत से संवाद कर रहे हैं तो उनसे कह रहे है कि प्रजा पर ज्यादा टैक्स नहीं लगाया जाना चाहिए और चाणक्य ने भी कहा है कि टैक्स ज्यादा नहीं होना चाहिए नहीं तो प्रजा हमेशा गरीब रहेगी, अगर सरकार की आमदनी बढ़ानी है तो लोगों का उत्पादन और व्यापार बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करो | अंग्रेजों ने तो 23 प्रकार के टैक्स लगाये थे उस समय इस देश को लुटने के लिए, अब तो इस देश में VAT को मिला के 64 प्रकार के टैक्स हो गए हैं |

महात्मा गाँधी के देश में नमक पर भी टैक्स हो गया है और नमक भी विदेशी कंपनियां बेंच रही हैं, आज अगर गाँधी जी की आत्मा स्वर्ग से ये देखती होगी तो आठ-आठ आंसू रोती होगी कि जिस देश में मैंने नमक सत्याग्रह किया कि विदेशी कंपनी का नमक न खाया जाये आज उस देश में लोग विदेश कंपनी का नमक खरीद रहे हैं और नमक पर टैक्स लगाया जा रहा है | शायद हमको मालूम नहीं है कि हम कितना बड़ा National Crime कर रहे हैं |

*Indian Forest Act -* 1865 में Indian Forest Act बनाया गया और ये लागू हुआ 1872 में | इस कानून के बनने के पहले जंगल गाँव की सम्पति माने जाते थे और गाँव के लोगों की सामूहिक हिस्सेदारी होती थी इन जंगलों में, वो ही इसकी देखभाल किया करते थे, इनके संरक्षण के लिए हर तरह का उपाय करते थे, नए पेड़ लगाते थे और इन्ही जंगलों से जलावन की लकड़ी इस्तेमाल कर के वो खाना बनाते थे |

अंग्रेजों ने इस कानून को लागू कर के जंगल के लकड़ी के इस्तेमाल को प्रतिबंधित कर दिया | साधारण आदमी अपने घर का खाना बनाने के लिए लकड़ी नहीं काट सकता और अगर काटे तो वो अपराध है और उसे जेल हो जाएगी, अंग्रेजों ने इस कानून में ये प्रावधान किया कि भारत का कोई भी आदिवासी या दूसरा कोई भी नागरिक पेड़ नहीं काट सकता और आम लोगों को लकड़ी काटने से रोकने के लिए उन्होंने एक पोस्ट बनाया District Forest Officer जो उन लोगों को तत्काल सजा दे सके, उस पर केस करे, उसको मारे-पीटे |

लेकिन दूसरी तरफ जंगलों के लकड़ी की कटाई के लिए ठेकेदारी प्रथा लागू की गयी जो आज भी लागू है और कोई ठेकेदार जंगल के जंगल साफ़ कर दे तो कोई फर्क नहीं पड़ता | अंग्रेजों द्वारा नियुक्त ठेकेदार जब चाहे, जितनी चाहे लकड़ी काट सकते हैं | हमारे देश में एक अमेरिकी कंपनी है जो वर्षों से ये काम कर रही है, उसका नाम है ITC पूरा नाम है Indian Tobacco Company इसका असली नाम है American Tobacco Company, और ये कंपनी हर साल 200 अरब सिगरेट बनाती है और इसके लिए 14 करोड़ पेड़ हर साल काटती है | इस कंपनी के किसी अधिकारी या कर्मचारी को आज तक जेल की सजा नहीं हुई क्योंकि ये इंडियन फोरेस्ट एक्ट ऐसा है जिसमे सरकार के द्वारा अधिकृत ठेकेदार तो पेड़ काट सकते हैं लेकिन आप और हम चूल्हा जलाने के लिए, रोटी बनाने के लिए लकड़ी नहीं ले सकते और उससे भी ज्यादा ख़राब स्थिति अब हो गयी है, आप अपने जमीन पर के पेड़ भी नहीं काट सकते |

तो कानून ऐसे बने हुए हैं कि साधारण आदमी को आप जितनी प्रताड़ना दे सकते हैं, दुःख दे सकते है, दे दो विशेष आदमी को आप छू भीं नहीं सकते | और जंगलों की कटाई से घाटा ये हुआ कि मिटटी बह-बह के नदियों में आ गयी और नदियों की गहराई को इसने कम कर दिया और बाढ़ का प्रकोप बढ़ता गया |

*Indian Penal Code *- अंग्रेजों ने एक कानून हमारे देश में लागू किया था जिसका नाम है Indian Penal Code (IPC ) | ये Indian Penal Code अंग्रेजों के एक और गुलाम देश Ireland के Irish Penal Code की फोटोकॉपी है, वहां भी ये IPC ही है लेकिन Ireland में जहाँ "I" का मतलब Irish है वहीं भारत में इस "I" का मतलब Indian है, इन दोनों IPC में बस इतना ही अंतर है बाकि कौमा और फुल स्टॉप का भी अंतर नहीं है | अंग्रेजों का एक अधिकारी था .वी.मैकोले, उसका कहना था कि भारत को हमेशा के लिए गुलाम बनाना है तो इसके शिक्षा तंत्र और न्याय व्यवस्था को पूरी तरह से समाप्त करना होगा |

और आपने अभी ऊपर Indian Education Act पढ़ा होगा, वो भी मैकोले ने ही बनाया था और उसी मैकोले ने इस IPC की भी ड्राफ्टिंग की थी | ये बनी 1840 में और भारत में लागू हुई 1860 में | ड्राफ्टिंग करते समय मैकोले ने एक पत्र भेजा था ब्रिटिश संसद को जिसमे उसने लिखा था कि "मैंने भारत की न्याय व्यवस्था को आधार देने के लिए एक ऐसा कानून बना दिया है जिसके लागू होने पर भारत के किसी आदमी को न्याय नहीं मिल पायेगा | इस कानून की जटिलताएं इतनी है कि भारत का साधारण आदमी तो इसे समझ ही नहीं सकेगा और जिन भारतीयों के लिए ये कानून बनाया गया है उन्हें ही ये सबसे ज्यादा तकलीफ देगी |

और भारत की जो प्राचीन और परंपरागत न्याय व्यवस्था है उसे जडमूल से समाप्त कर देगा"| और वो आगे लिखता है कि " जब भारत के लोगों को न्याय नहीं मिलेगा तभी हमारा राज मजबूती से भारत पर स्थापित होगा" | ये हमारी न्याय व्यवस्था अंग्रेजों के इसी IPC के आधार पर चल रही है | और आजादी के 64 साल बाद हमारी न्याय व्यवस्था का हाल देखिये कि लगभग 4 करोड़ मुक़दमे अलग-अलग अदालतों में पेंडिंग हैं, उनके फैसले नहीं हो पा रहे हैं | 10 करोड़ से ज्यादा लोग न्याय के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं लेकिन न्याय मिलने की दूर-दूर तक सम्भावना नजर नहीं आ रही है, कारण क्या है ? कारण यही IPC है |

IPC का आधार ही ऐसा है | और मैकोले ने लिखा था कि "भारत के लोगों के मुकदमों का फैसला होगा, न्याय नहीं मिलेगा" | मुक़दमे का निपटारा होना अलग बात है, केस का डिसीजन आना अलग बात है, केस का जजमेंट आना अलग बात है और न्याय मिलना बिलकुल अलग बात है | अब इतनी साफ़ बात जिस मैकोले ने IPC के बारे में लिखी हो उस IPC को भारत की संसद ने 64 साल बाद भी नहीं बदला है और ना कभी कोशिश ही की है |

*L*** Acquisition Act -* एक अंग्रेज आया इस देश में उसका नाम था डलहौजी | ब्रिटिश पार्लियामेंट ने उसे एक ही काम के लिए भारत भेजा था कि तुम जाओ और भारत के किसानों के पास जितनी जमीन है उसे छिनकर अंग्रेजों के हवाले करो | डलहौजी ने इस "जमीन को हड़पने के कानून" को भारत में लागू करवाया, इस कानून को लागू कर के किसानों से जमीने छिनी गयी | जो जमीन किसानों की थी वो ईस्ट इंडिया कंपनी की हो गयी | डलहौजी ने अपनी डायरी में लिखा है कि " मैं गाँव गाँव जाता था और अदालतें लगवाता था और लोगों से जमीन के कागज मांगता था" |

और आप जानते हैं कि हमारे यहाँ किसी के पास उस समय जमीन के कागज नहीं होते थे क्योंकि ये हमारे यहाँ परंपरा से चला आ रहा था या आज भी है कि पिता की जमीन या जायदाद बेटे की हो जाती है, बेटे की जमीन उसके बेटे की हो जाती है | सब जबानी होता था, जबान की कीमत होती थी या आज भी है आप देखते होंगे कि हमारे यहाँ जो शादियाँ होती हैं वो सिर्फ और सिर्फ जबानी समझौते से होती है कोई लिखित समझौता नहीं होता है, एक दिन /तारीख तय हो जाती है और लड़की और लड़का दोनों पक्ष शादी की तैयारी में लग जाते है लड़के वाले निर्धारित तिथि को बारात ले के लड़की वालों के यहाँ पहुँच जाते है, शादी हो जाती है |

तो कागज तो किसी के पास था नहीं इसलिए सब की जमीनें उस अत्याचारी डलहौजी ने हड़प ली | एक दिन में पच्चीस-पच्चीस हजार किसानों से जमीनें छिनी गयी | परिणाम क्या हुआ कि इस देश के करोड़ों किसान भूमिहीन हो गए | डलहौजी के आने के पहले इस देश का किसान भूमिहीन नहीं था, एक-एक किसान के पास कम से कम 10 एकड़ जमीन थी, ये अंग्रेजों के रिकॉर्ड बताते हैं | डलहौजी ने आकर इस देश के 20 करोड़ किसानों को भूमिहीन बना दिया और वो जमीने अंग्रेजी सरकार की हो गयीं |

1947 की आजादी के बाद ये कानून ख़त्म होना चाहिए था लेकिन नहीं, इस देश में ये कानून आज भी चल रहा है | हम आज भी अपनी खुद की जमीन पर मात्र किरायेदार हैं, अगर सरकार का मन हुआ कि आपके जमीन से होके रोड निकाला जाये तो आपको एक नोटिस दी जाएगी और आपको कुछ पैसा दे के आपकी घर और जमीन ले ली जाएगी | आज भी इस देश में किसानों की जमीन छिनी जा रही है बस अंतर इतना ही है कि पहले जो काम अंग्रेज सरकार करती थी वो काम आज भारत सरकार करती है | पहले जमीन छीन कर अंग्रेजों के अधिकारी अंग्रेज सरकार को वो जमीनें भेंट करते थे, अब भारत सरकार वो जमीनें छिनकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भेंट कर रही है और Special Economic Zone उन्हीं जमीनों पर बनाये जा रहे हैं और ये जमीन बहुत बेदर्दी से लिए जा रहे हैं | भारतीय या बहुराष्ट्रीय कंपनी को कोई जमीन पसंद आ गयी तो सरकार एक नोटिस देकर वो जमीन किसानों से ले लेती है और वही जमीन वो कंपनी वाले महंगे दाम पर दूसरों को बेचते हैं |

जिसकी जमीन है उसके हाँ या ना का प्रश्न ही नहीं है, जमीन की कीमत और मुआवजा सरकार तय करती है, जमीन वाले नहीं | एक पार्टी की सरकार वहां पर है तो दूसरी पार्टी का नेता वहां पहुँच के घडियाली आंसू बहाता है और दूसरी पार्टी की सरकार है तो पहले वाला पहुँच के घडियाली आंसू बहाता है लेकिन दोनों पार्टियाँ मिल के इस कानून को ख़त्म करने की कवायद नहीं करते और 1894 का ये अंग्रेजों का कानून बिना किसी परेशानी के इस देश में आज भी चल रहा है | इसी देश में नंदीग्राम होते हैं, इसी देश में सिंगुर होते हैं और अब नोएडा हो रहा है | जहाँ लोग नहीं चाहते कि हम हमारी जमीन छोड़े, वहां लाठियां चलती हैं, गोलियां चलती है | आपको लगता है कि ये देश आजाद हो गया है ? मुझे तो नहीं लगता |

*Indian Citizenship Act -* अंग्रेजों ने एक कानून लाया था Indian Citizenship Act, आप और हम भारत के नागरिक हैं तो कैसे हैं, उसके Terms और Condition अंग्रेज तय कर के गए हैं | अंग्रेजों ने ये कानून इसलिए बनाया था कि अंग्रेज भी इस देश के नागरिक हो सकें | तो इसलिए इस कानून में ऐसा प्रावधान है कि कोई व्यक्ति (पुरुष या महिला) एक खास अवधि तक इस देश में रह ले तो उसे भारत की नागरिकता मिल सकती है (जैसे बंगलादेशी शरणार्थी) | लेकिन हमने इसमें आज 2011 तक के 64 सालों में रत्ती भर का भी संशोधन नहीं किया | इस कानून के अनुसार कोई भी विदेशी आकर भारत का नागरिक हो सकता है, नागरिक हो सकता है तो चुनाव लड़ सकता है, और चुनाव लड़ सकता है तो विधायक और सांसद भी हो सकता है, और विधायक और सांसद बन सकता है तो मंत्री भी बन सकता है, मंत्री बन सकता है तो प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भी बन सकता है | ये भारत की आजादी का माखौल नहीं तो और क्या है ?

दुनिया के किसी भी देश में ये व्यवस्था नहीं है | आप अमेरिका जायेंगे और रहना शुरू करेंगे तो आपको ग्रीन कार्ड मिलेगा लेकिन आप अमेरिका के राष्ट्रपति नहीं बन सकते, जब तक आपका जन्म अमेरिका में नहीं हुआ होगा | ऐसा ही कनाडा में है, ब्रिटेन में है, फ़्रांस में है, जर्मनी में है | दुनिया में 204 देश हैं लेकिन दो-तीन देश को छोड़ के हर देश में ये कानून है कि आप जब तक उस देश में पैदा नहीं हुए तब तक आप किसी संवैधानिक पद पर नहीं बैठ सकते, लेकिन भारत में ऐसा नहीं है | कोई भी विदेशी इस देश की नागरिकता ले सकता है और इस देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन हो सकता है और आप उसे रोक नहीं सकते, क्योंकि कानून है, Indian Citizenship Act , उसमे ये व्यवस्था है | ये अंग्रेजों के समय का कानून है, हम उसी को चला रहे हैं, उसी को ढो रहे हैं आज भी, आजादी के 64 साल बाद भी | आप समझते हैं कि हमारी एकता और अखंडता सुरक्षित रहेगी ?

*Indian Advocates Act -* हमारे देश में जो अंग्रेज जज होते थे वो काला टोपा लगाते थे और उसपर नकली बालों का विग लगाते थे | ये व्यवस्था आजादी के 40-50 साल बाद तक चलता रहा था| हमारे यहाँ वकीलों का जो ड्रेस कोड है वो इसी कानून के आधार पर है, काला कोट, उजला शर्ट और बो ये हैं वकीलों का ड्रेस कोड | काला कोट जो होता है वो आप जानते हैं कि गर्मी को सोखता है, और अन्दर की गर्मी को बाहर नहीं निकलने देता, और इंग्लैंड में चुकी साल में 8-9 महीने भयंकर ठण्ड पड़ती है तो उन्होंने ऐसा ड्रेस अपनाया, अब हम भारत में भी ऐसा ही ड्रेस पहन रहे हैं ये समझ से बाहर की बात है | हमारे यहाँ का मौसम गर्म है और साल में नौ महीने तो बहुत गर्मी रहती है और अप्रैल से अगस्त तक तो तापमान 40-50 डिग्री तक हो जाता है फिर ऐसे ड्रेस को पहनने से क्या फायदा जो शरीर को कष्ट दे, कोई और रंग भी तो हम चुन सकते थे काला रंग की जगह, लेकिन नहीं | हमारे देश में आजादी के पहले के जो वकील हुआ करते थे वो ज्यादा हिम्मत वाले थे | लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक हमेशा मराठी पगड़ी पहन कर अदालत में बहस करते थे और गाँधी जी ने कभी काला कोट नहीं पहना और इसके लिए कई बार उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ा था, लेकिन उन लोगों ने कभी समझौता नहीं किया |

*Indian Motor Vehicle Act -* उस ज़माने में कार/मोटर जो था वो सिर्फ अंग्रेजों, रजवाड़ों और पैसे वालों के पास होता था तो इस कानून में प्रावधान डाला गया कि अगर किसी को मोटर से धक्का लगे या धक्के से मौत हो जाये तो सजा नहीं होनी चाहिए या हो भी तो कम से कम | साल डेढ़ साल की सजा हो ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए उसको हत्या नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि हत्या में तो धारा 302 लग जाएगी और वहां हो जाएगी फाँसी या आजीवन कारावास, तो अंग्रेजों ने इस एक्ट में ये प्रावधान रखा कि अगर कोई (अंग्रेजों के) मोटर के नीचे दब के मरा तो उसे कठोर और लम्बी सजा ना मिले | ये व्यवस्था आज भी जारी है और इसीलिए मोटर के धक्के से होने वाली मौत में किसी को सजा नहीं होती | और सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस देश में हर साल डेढ़ लाख लोग गाड़ियों के धक्के से या उसके नीचे आ के मरते हैं लेकिन आज तक किसी को फाँसी या आजीवन कारावास नहीं हुआ |

*Indian Agricultural Price Commission Act -* ये भी अंग्रेजों के ज़माने का कानून है | पहले ये होता था कि किसान, जो फसल उगाते थे तो उनको ले के मंडियों में बेचने जाते थे और अपने लागत के हिसाब से उसका दाम तय करते थे | अंग्रेजों ने हमारे कृषि व्यवस्था को ख़त्म करने के लिए ये कानून लाया और किसानों को उनके फसल का दाम तय करने का अधिकार समाप्त कर दिया | अंग्रेज अधिकारी मंडियों में जाते थे और वो किसानों के फसल का मूल्य तय करते थे कि आज ये अनाज इस मूल्य में बिकेगा और ये अनाज इस मूल्य में बिकेगा, ऐसे ही हर अनाज का दाम वो तय करते थे | आप हर साल समाचारों में सुनते होंगे कि "सरकार ने गेंहू का,धान का, खरीफ का, रबी का समर्थन मूल्य तय किया" |

ये किसानों के फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य होता है, मतलब किसानों के फसलों का आधिकारिक मूल्य होता है | इससे ज्यादा आपके फसल का दाम नहीं होगा | किसानों को अपने उपजाए अनाजों का दाम तय करने का अधिकार आज भी नहीं है इस आजाद भारत में | उनका मूल्य तय करना सरकार के हाथ में होता है | और आज दिल्ली के AC Room में बैठ कर वो लोग किसानों के फसलों का दाम तय करते हैं जिन्होंने खेतों में कभी पसीना नहीं बहाया और जो खेतों में पसीना बहाते हैं, वो अपने उत्पाद का दाम नहीं तय कर सकते |

*Indian Patent Act - * अंग्रेजों ने एक कानून लाया Patent Act , और वो बना था 1911 | Patent मतलब होता है एक तरह का Legal Right, कोई व्यक्ति, वैज्ञानिक या कंपनी अगर किसी चीज का आविष्कार करती है तो उसे उस आविष्कार पर एक खास अवधि के लिए अधिकार दिया जाता है | ये जा के 1970 में ख़त्म हुआ श्रीमती इंदिरा गाँधी के प्रयासों से लेकिन इसे अब फिर से बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव में बदल दिया गया है | अभी विस्तार से नहीं लिखूंगा मतलब इस देश के लोगों के हित से ज्यादा जरूरी है बहुराष्ट्रीय कंपनियों का हित |

ये हैं भारत के विचित्र कानून, सब पर लिखना संभव नहीं है और ज्यादा बोझिल न हो जाये इसलिए यहीं विराम देता हूँ | इन कानूनों के किताब बाज़ार में उपलब्ध हैं लेकिन मैंने इनके इतिहास को वर्तमान के साथ जोड़ के आपके सामने प्रस्तुत किया है, और इन कानूनों का इतिहास, उन पर हुई चर्चा को ब्रिटेन के संसद House of Commons की library से लिया गया हैं | अब कुछ छोटे-छोटे कानूनों की चर्चा करता हूँ |

- अंग्रेजों ने एक कानून बनाया था कि गाय को, बैल को, भैंस को डंडे से मारोगे तो जेल होगी लेकिन उसे गर्दन से काट कर उसका माँस निकलकर बेचोगे तो गोल्ड मेडल मिलेगा क्योंकि आप Export Income बढ़ा रहे हैं | ये कानून अंग्रेजों ने हमारी कृषि व्यवस्था को बर्बाद करने के लिए लाया था | लेकिन आज भी भारत में हजारों कत्लखाने गायों को काटने के लिए चल रहे हैं |

- 1935 में अंग्रेजों ने एक कानून बनाया था उसका नाम था Government of India Act, ये अंग्रेजों ने भारत को 1000 साल गुलाम बनाने के लिए बनाया था और यही कानून हमारे संविधान का आधार बना |

- 1939 में राशन कार्ड का कानून बनाया गया क्योंकि उसी साल द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हुआ और अंग्रेजों को धन के साथ-साथ भोजन की भी आवश्यकता थी तो उन्होंने भारत से धन भी लिया और अनाज भी लिया और इसी समय राशन कार्ड की शुरुआत की गयी | और जिनके पास राशन कार्ड होता था उन्हें सस्ते दाम पर अनाज मिलता था और जिनके पास राशन कार्ड होता था उन्हें ही वोट देने का अधिकार था | और अंग्रेजों ने उस द्वितीय विश्वयुद्ध में 1732 करोड़ स्टर्लिंग पोंड का कर्ज लिया था भारत से जो आज भी उन्होंने नहीं चुकाया है और ना ही किसी भारतीय सरकार ने उनसे ये मांगने की हिम्मत की पिछले 64 सालों में | - अंग्रेजों को यहाँ से चीनी की आपूर्ति होती थी | और भारत के लोग चीनी के बजाय गुड (Jaggary) बनाना पसंद करते थे और गन्ना चीनी मीलों को नहीं देते थे | तो अंग्रेजों ने गन्ना उत्पादक इलाकों में गुड बनाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया और गुड बनाना गैरकानूनी घोषित कर दिया था और वो कानून आज भी इस देश में चल रहा है | - पहले गाँव का विकास गाँव के लोगों के जिम्मे होता था और वही लोग इसकी योजना बनाते थे |

किसी गाँव की क्या आवश्यकता है, ये उस गाँव के रहने वालों से बेहतर कौन जान सकता है लेकिन गाँव के उस व्यवस्था को तोड़ने के लिए अंग्रेजों ने PWD की स्थापना की | वो PWD आज भी है | NGO भी इसीलिए लाया गया था, ये भी अंग्रेजों ने ही शुरू किया था | - हमारे देश में सीमेंट नहीं होता था बल्कि चुना और दूध को मिलाकर जो लेप तैयार होता था उसी से ईंटों को जोड़ा जाता था | अंग्रेजों ने अपने देश का सीमेंट बेचने के लिए 1850 में इस कला को प्रतिबंधित कर दिया और सीमेंट को भारत के बाजार में उतारा | हमारे देश के किलों (Forts) को आप देखते होंगे सब के सब इसी भारतीय विधि से खड़े हुए थे और आज भी कई सौ सालों से खड़े हैं | और सीमेंट से बने घरों की अधिकतम उम्र होती है 100 साल और चुने से बने घरों की न्यूनतम उम्र होती है 500 साल | - आप दक्षिण भारत में भव्य मंदिरों की एक परमपरा देखते होंगे, इन मंदिरों को पेरियार जाती के लोग बनाते थे आज की भाषा में वो सबके सब सिविल इंजिनियर थे, बहुत अद्भुत मंदिरों का निर्माण किया उन्होंने |

एक अंग्रेज अधिकारी था A.O.Hume, इसी ने 1885 में कांग्रेस की स्थापना की थी, जब ये 1890 में मद्रास प्रेसिडेंसी में अधिकारी बन के गया तो इसने वहां इस जाति को मंदिरों के निर्माण करने से प्रतिबंधित कर दिया, गैरकानूनी घोषित कर दिया | नतीजा क्या हुआ कि वो भव्य मंदिरों की परंपरा तो ख़त्म हुई ही साथ ही साथ वो सभी बेरोजगार हो गए और हमारी एक भवन निर्माण कला समाप्त हो गयी | वो कानून आज भी है | - उड़ीसा में नहर के माध्यम से खेतों में पानी तब छोड़ा जाता था जब उसकी जरूरत नहीं होती थी और जब जरूरत होती थी यानि गर्मियों में तो उस समय नहरों में पानी नहीं दिया जाता था | आप भारत के पूर्वी इलाकों को देखते होंगे, जिसमे शामिल हैं पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखण्ड और उड़ीसा, ये इलाके पिछड़े हुए हैं |

कभी आपने सोचा है कि ये इलाके क्यों पिछड़े हुए हैं ? जब कि भारत के 90% Minerals इसी इलाके में होते हैं | अभी मुझे इससे सम्बंधित दस्तावेज मिल नहीं पाए हैं इसलिए इस पर ज्यादा नहीं लिखूंगा | कभी मैं विलियम बेंटिक और मैकोले के बीच हुई बातचीत के बारे में लिखूंगा कि कैसे वो अपने बातचीत में कलकत्ता और लन्दन की तुलना कर रहे हैं, और 1835 के आस पास हुई बातचीत के आधार पर ये जाहिर होता है कि लन्दन निहायती घटिया शहर है और कलकत्ता उस समय सबसे समृद्ध | - एक कानून के हिसाब से बच्चे को पेट में मारोगे तो Abhortion और पैदा होने पर मारोगे तो हत्या | Abhortion हुआ तो कुछ नहीं लेकिन उसे पैदा होने के बाद मारा तो हत्या का मामला बनेगा | - अंग्रेजों ने सेना के लिए कानून बनाया था |

इसके सैनिकों को मूंछ (mustache) रखने पर अतिरिक्त भत्ता मिलता था | सेना में आज भी मूंछ रखने पर उसके देख रेख और maintainance के लिए भत्ता मिलता है |

- आपमें से बहुतों ने क़ुतुब मीनार के पास एक लोहे का स्तम्भ देखा होगा जो सैकड़ों साल से खुले में है लेकिन आज तक उसमे जंग (Rust) नहीं लगा है | ये स्टील बनाने की जो कला थी वो हमारे देश के आदिवासियों के पास थी जो कि आज के झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और ओड़िसा के...