सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

हो समय ने फिर ललकारा है---



हो समय ने फिर ललकारा है।
देश धर्म द्रोहियों से लड़ना हमारा नारा है।।स्थाई।।

हम भारत के वासी हमारा राज प्रजातन्त्र है।
वेदों के उपासक हमारी संस्कृति पवित्रा है।
खुद जीयें और जीने दें ऐसा हमारा चरित्र है।
कभी इन्सानियत से हमने रिश्ता तोड़ा नहीं।
सच्चाई कि रास्ते से हमने मुंह मोड़ा नहीं।
जिसने हमको छेड़ा पहले उसको हमने छोड़ा नहीं।
हो जानता यह जग सारा है
बड़े-बड़े खूंखारों का हमने मुंह मारा है।।1।।

देश की अखण्डता को खण्डित नहीं होने देंगे।
आपस में हम फूट के बीज नहीं बोने देंगे।
आजादी रूपी दौलत को हरगिज नहीं खोने देंगे।
 जो करते हैं बकवास आज गैरों के इशारों पर।
लानत है ऐसे देश द्रोही गद्दारों पर ।
करें न विश्वास कभी भूलकर मक्कारों पर।
 हो हुआ दिल दुःखी हमारा है।
ईंट का जवाब देंगे पत्थर से और न चारा है।।2।।

गर पहले हमारे नेता ऐसी गलती खाते ना।
तो आज के ये दिन कभी देखने में आते ना।
मुट्ठी भर ये लोग कभी शोर यों मचाते ना।
हमने इनकी नीयत को अच्छी तरह पहचाना है।
चण्डीगढ़ का फैसला तो झूठा सा बहाना है।
सिर्फ इनका एक खालिस्तान का निशाना है।
हो खास गैरों का इशारा है।
हो खुलमखुल्ला पापिस्तान ये नाच नचारा है।।3।।

देश को जरूरत है मजबूत कर्णधारों की।
देश को जरूरत है पटेल से सरदारों की।
देश को जरूरत नहीं इन फिल्मी सितारों की।
कुर्सी के पुजारी अपनी कुर्सी को बचाते रहेंगे।
ये कर दिया वो कर दिया शोर यों मचाते रहेंगे।
उधर बेगुनाहों का खून वो बहाते रहेंगे।
हो बड़ा ये खतरा भारा है
कहे ‘खेमसिंह’ कहीं देश का ना हो जाये बटवारा है।।4।।

गुरुवार, 24 जनवरी 2013

स्वयं को पहचानें

स्वयं को पहचानें

मानव जीवन स्वयं को जानने का अनमोल क्षण 

युगों से चले आ रहे इस परिवर्तनशील संसार में सब अस्थिर सा दिखलाई देता है। भूमि पर स्थित सभी पदार्थों में कालान्तर में परिवर्तन दिखाई पड़ता है। भूमि पर बीज के गिरने के बाद मिट्टी, पानी, खाद, हवा, उष्मा व समय के अनुसार वह बीज अंकुरित हो लहलहाने लगता है, पुष्प, पराग, फल  आये व पौधा विशीर्ण हो जाता है, लेकिन अपनी समाप्ति के बाद भी वह अनेक बीज उत्पन्न कर जाता है। एक भ्रूण बालक-बालिका के रूप में जन्म लेकर विभिन्न शारीरिक शिशु, बाल, किशोर, कुमार, युवा, प्रौढ़ व वृद्ध आदि अवस्थाओं को प्राप्त कर कालकवलित हो जाता है। क्या सब कुछ ऐसे ही समाप्त होने वाला है, या कुछ ऐसा भी तत्त्व हो जो शाश्वत है, अजर या अमर है ? जब व्यक्ति अपने चर्म चक्षुओं व अन्य इन्द्रियों से संसार में स्थिर आनन्द प्रदान करने वाली वस्तुओं का उपभोग करता है, तो वे उसको शाश्वत आनन्द प्रदान न कर क्षणिक, अल्प व दुःख मिश्रित आनन्द प्रदान करती हैं। आजीवन मानव ढेर सारे भौतिक पदार्थों को संचित करता है कि हो सकता है कि अमुख पदार्थ की प्राप्ति से उसे अनन्त सुख की प्राप्ति हो जायेगी लेकिन ये क्या वस्तु प्राप्ति के बाद ही उसकी उत्कट आनन्द की अभिलाषा समाप्त हो जाती है। उपनिषद् कहते हैं न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यः अर्थात् केवल भौतिक पदार्थों के संचय से मानव की तृप्ति नहीं होने वाली है। 
इस संसार में वह कौनसा तत्त्व है जिसको जानने के बाद अतुला पृथ्वी का स्वामी व्यक्ति उसे छोड़ने को तत्पर हो जाता है, वह कौनसा तत्त्व है जिसको जानने की इच्छा नचिकेता ने यमाचार्य से की, यमाचार्य के द्वारा अनन्त धन-ऐश्वर्य उसके बदले में देने चाहे लेकिन नचिकेता ने उन सबको नश्वर बतलाकर उन पदार्थों से किनारा कर लिया व केवल उसी तत्त्व को जानने की इच्छा प्रकट की ? वह तत्त्व जिसको जानने के लिए अनेकों ऋषि- महर्षियों ने आजीवन तप किया ? छोटा सा बालक अभी जिसको संसार में आये केवल 10-11 दिन ही बीते हैं उसका नामकरण-संस्कार करते समय उसका पिता वेद मंत्र के माध्यम से उससे पूछता है कोऽसि कतमोऽसि कस्यासि को नामासि अर्थात् तू कौन है, तेरा कौनसा जन्म है तू किसका है तेरा नाम क्या है ? वह छोटा अबोध बालक उत्तर देने में असमर्थ है लेकिन पिता उसको उसी मन्त्र में उसका उत्तर भी देता है कि हे बालक ! अमृतोऽसि तू अमृत है तू मरणधर्मा नहीं अपितु अजर व अमर है।
इस मानव जीवन को जीने की दो पद्धतियां हमारे सामाजिक उन्नायकों ने हमें प्रदान की है पहली पद्धति श्रेय व दूसरी पद्धति प्रेय अर्थात् श्रेय अध्यात्म व प्रेय भौतिक उन्नति को साथ-साथ करने निर्देश दिया। अध्यात्म का पथ हमें स्वयं को जानने व भौतिक पथ संसार को जानने का मार्ग दिखलाता है। जो सशरीर सांसारिक संबन्ध हमारे व्यवहारिक जीवन में दिखलाई पड़ते हैं वे आवश्यकता व कार्य के कारण बनते बिगड़ते रहते हैं, लेकिन इसके अतिरिक्त जो हमारी स्वयं की आत्मिक अर्थात् आत्मा के रूप में अनुभूति है वह हमारी स्वयं की पहचान है। एक ही जीवन में हमारे विभिन्न सांसारिक सम्बन्ध होते हैं यह हमारे शरीर की पहचान है, इसके विपरीत हमारी अपनी व्यक्तिगत आत्मिक पहचान है वही हमारी असली पहचान है। अब प्रश्न उठता है कि इसकी पहचान कैसे की जाये क्या ऐसे उपाय हैं कि जिसके माध्यम से हम स्वयं की पहचान कर सकें, स्वयं को शरीर के रूप में नहीं अपितु आत्मा के रूप में जान सकें ? क्या ऐसा किसी ने जाना भी है या नहीं ? इन तमाम सवालों के जवाब सदियों से भारतीय अध्यात्मिक परम्परा में खोजे जाते रहे हैं, हमारे ऋषियों ने इन रहस्ययुक्त सवालों के जवाब ढूंढ़कर आमजन के लिए स्वयं को जानने व पहचानने के जवाब सूत्र रूप में उपस्थित किये हैं।
मोटे तौर पर मुख्य रूप से तीन प्रकार के तत्त्व इस संसार में बतलाये गये हैं प्रथम ईश्वर द्वितीय आत्मा व तृतीय प्रकृति इनमें से हमारी पहचाना आत्मा के रूप में होती है। स्वयं को जानने के भी तीन उपाय बतलाये गये हैं शुद्ध ज्ञान, शुद्ध कर्म व शुद्ध उपासना। एक छात्र जिसको विभिन्न प्रतियोगी परिक्षाओं में उत्तीर्ण होना है तो निश्चित रूप से उसे निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुसार उसे सही पुस्तकों व सही प्रशिक्षक से प्रशिक्षण लेना होगा व उसके दिशा-निर्देशों के अनुसार परीक्षा की तैयारी करनी होगी व अपने विवेक से भी सही निर्णण लेने होंगे तो निश्चय ही उसको सफलता की प्राप्ति होगी यदि व गलत ज्ञान व गलत तरीकों का प्रयोग करेगा तो निश्चय ही उसे असफलता का मुख देखना होगा इसी प्रकार से हमें अपने स्वयं के ज्ञान हेतु सर्वप्रथम शुद्ध ज्ञान की आवश्यकता होगी। शुद्ध ज्ञान की परख करने के लिए भी विभिन्न उपाय व कसौटियां हमारे समक्ष उपलब्ध हैं उनसे शुद्ध ज्ञान ही को ग्रहण करना, शुद्ध ज्ञान की प्राप्ति के साधन स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यं अर्थात् स्वाध्याय प्रवचन से प्रमाद न करना स्वाध्याय के अन्तर्गत दो बातें मुख्यरूप से आती हैं एक स्व$अध्ययन अपने आपको जानना दूसरा योग्य विद्वानों के ग्रन्थों का अध्ययन, चिन्तन, मनन करना और उन्हीं बातों से अन्य व्यक्तियों को अवगत कराना। कबीरा जब आये जगत में जग हंसा हम रोये।ऐसी करनी कर चलें, हम हंसंे जग रोये।।
केवल शुद्ध ज्ञान से हमारी स्वयं की पहचान नहीं हो पायेगी, जो हमने सीखा है उसको अपने जीवन में शुद्धकर्म करके उतारना भी आवश्वयक है। स्वयं को जानने के कुछ उपाय योगदर्शनकार ने बताये हैं जिनमें मुख्यरूप से योग के आठ अंग हैं जिनमें यम, नियम, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान व समाधि हैं। इनमें से प्रथम दो अंग यम व नियम हमारे सामाजिक जीवन से जुडे़ हुए हैं। हमारा व्यक्तिगत व सामाजिक जीवन समान होना चाहिए। यम अंग में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह व नियम अंग में शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय व ईश्वरप्रणिधान हैं। हमारे अनेक महापुरुषों ने अहिंसा को परमधर्म तक घोषित किया है। अहिंसा का मतलब वैरत्याग अर्थात् समस्त प्राणियों में मित्रभाव रखना। मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे। सत्य जो प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से सत्य ही हो उसी बात को मानना व करना। अस्तेय के लिए वेद में आया है मा गृधः कस्य स्विद्धनम् अर्थात् मनसा वाचा कर्मणा किसी की वस्तु चाहना न करना। ब्रह्मचर्य संयमित व संतुलित जीवन जीना। अपरिग्रह हानिकारक व अनावश्यक विचारों व वस्तुओं का संग्रह न करना। शौच- शरीर की जल से, मन की सत्य से, आत्मा की तप व विद्या से व बुद्धि की ज्ञान से शुद्धता रखना। सन्तोष- अपने पूर्ण पुरुषार्थ व परिश्रम से प्राप्त धन व वस्तुओं से सन्तुष्ट रहना। तप-श्रेष्ठ कार्यों को करते हुए द्वन्द्वों को सहना जैसे सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास, मान-अपमान, हानि-लाभ, जय-पराजय आदि। ईश्वरप्रणिधान- ईश्वर को अर्थात् परम सत्ता को स्मरण रखते हुए सभी कार्य करना। 
इस दुनिया में स्वयं को जानना सबसे बड़ी चुनौति भी है व कार्य भी, उपनिषद्कार कहते हैं आत्मा वा अरे द्रष्टव्यो श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः। स्वयं को देखना सुनना मानना व जानना ही परम लक्ष्य होना चाहिए। वेदानुसार नान्य पन्था विद्यते अयनाय इसको जानने के अलावा अन्य को मार्ग नहीं है। स्वयं को जानने के उपायों में प्रमुख कार्य नित्य प्रतिदिन प्रातः च सांयकाल आत्मचिन्तन करना जिस प्रकार एक वणिक् अपने प्रतिदिन के आय-व्यय का विवरण लिखता व देखता है उसी प्रकार स्वयं को जानने के लिए भी अपने नित्य प्रति के व्यवहारों व क्रियाकलापों को देखते व जानते रहना चाहिए। नकारात्मक विचारों को कोई जगह अपने जीवन में न दें। अपने सभी कार्यों में अपनी आत्मिक अनुभूति को ही सामने रखना चाहिए। सब जड़-चेतनादिकों में परमसत्ता परमात्मा को व भिन्न-भिन्न अपनी ही जैसी आत्माओं की अनुभूति करनी चाहिए। वास्तव में विद्वान् व श्रेष्ठ नर वही होता है जो आत्मवत् सर्वभूतेषु की पवित्र भावना को अपने में संजोये रखता है।
 भारतीय संस्कारों की परम्परा में एक छोटे से अबोध बालक को भी उसको स्वयं को जानने का सूत्र प्रदान कर दिया जाता है तो यह महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि हम स्वयं को अपने असल रूप में पहचानें। स्वयं को जानने से ही सबको जान लेने व उचित व्यावहारिक निर्णय लेने की क्षमता हमारे में पैदा होती है। मैं कौन हूँ का प्रश्न व इसका उत्तर आत्मा के रूप अपने साथ अवश्य रखें इसी में हम सब का कल्याण सन्निहित है।

लेखन-
नंदकिशोर आर्य 
गुरुकुल कुरुक्षेत्र