बुधवार, 31 अगस्त 2011

मौनव्रत का ढौंग


मौनव्रत का ढौंग

सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली वाली कहावत निश्चित रूप से स्वामी अग्निवेश जी पर चरितार्थ होती है। देश की जनता को बरगलाकर स्वामी अग्निवेश जी ने अपना जो उल्लू सीधा किया है, वह अब तक लोगों से छिपा रहा था। लेकिन अब जनता जागृत हो चुकी है व किसी भी प्रकार से झांसे में आने वाली नहीं है। स्वामी रामदेव जी व अन्ना हजारे जी के आन्दोलन से जो अंगडाई समाज ने ली है, उसको अब मूर्ख बनाना आसान नहीं होगा। देश के हालातों पर घड़ियाली आंसू बहाने वाले इन ढोंगी बाबाओं से सावधान रहने की पुरजोर आवश्यकता है। जो मियां व पादरी इनके आजू-बाजू दृष्टिगोचर होते थे उनसे भी सावधान होने की जरूरत है। गंगा गये तो गंगाराम जमुना गए तो जमनादास जैसे चरित्र वाले ढ़ोंगियों से सतर्क रहना आवश्यक है। अरे जो अपने देश का नहीं हो सका वह भला  किसका हो सकता है। जिस थाली में खाते हैं उसी थाली में छेद करने वाले छेदीलालों से बचकर रहना होगा। आर्यसमाज रूप वटवृक्ष को धराशायी करने वाले इस आस्तीन के सांप से सजग रहने की जरूरत है। अन्ना हजारे ही नहीं अपितु स्वामी रामदेव जी के अनशन को भंग करने का षडयन्त्र अपने आकाओं के साथ अग्निवेश जी ने ही रचा हो यह भी तो शंका हो सकती है। अरे ! जो जहां जाता है वहीं की वाणी का प्रयोग करता है वह विश्वसनीय कैसे हो सकता है। कुछ लोग कार्य को महत्त्व न देकर अपनी  छवि चमकाने में ही मशगूल रहते हैं। उन्हीं में से एक चेहरा है स्वामी अग्निवेश जी। 
अब जब देखा कि चारों तरफ तुम्हारे निकृष्ट कार्यों से थू-थू हो रही है, तो श्री श्री रविशंकर जी शरण में पहुंच गए क्योंकि पता है यह भी एक चर्चित चेहरा है व वहां से कुछ राहत मिल सकती है। जब आप अपने आप को आर्य विचारधारा का घोषित कर सार्वदेशिक प्रतिनिधि सभा पर सोनिया जी के आशीर्वाद से घुसपैठ किये बैठे हो, तो अब श्री श्री जी की शरण में क्यों ? जब आप मुस्लिमों के बीच बैठकर अमरनाथ यात्रा को पाखण्ड घोषित करते हो तो अब किस आत्मिक शान्ति के लिए पाखण्ड का पोषण करने वालों की शरण में शरणागत हो गये हो ? क्या आर्य समाज में साधकों व साधना  के उपायों की कमी थी जो श्री श्री की शरण लेनी पड़ी ? क्या आपका विश्वास जिसे आप हवन एण्ड कम्पनी कहते हैं उससे विश्वास उठ गया है ? अरे कुछ तो शर्म करो, इस ऋषियों के देश को अपने घृणित विचारों से मुक्त ही रहने दो तो अच्छा होगा। केवल मौन व्रत धारण करने से कृत पाप धुलने वाले नहीं हैं। अच्छा होगा जो हमेशा के लिए मौन धारण कर लें ताकि भारतीय जनमानस aapke  कलुषित व दूषित विचारों से बच सके।

शनिवार, 27 अगस्त 2011

शक जो बदल गया है सच में

शक जो बदल गया है सच में

5 अप्रैल,2011 को श्री अन्ना हजारे जी द्वारा जन-लोकपाल के लिए जो जन्तर मन्तर पर आमरण अनशन किया गया, जिसमें एक चहरा जो आर्यों का मुखौटे के रूप में जाना जाता है स्वामी अग्निवेश जी। आप ने अवश्य ही उस अप्रैल के दौर में इनको  सन्देशवाहक के रूप में देखा होगा, जो अन्ना जी व सरकार के मध्य मध्यस्था करते नजर आ रहे थे। उस आन्दोलन को बहुत ही जल्दी कुछ वादों के साथ ठण्डा कर दिया गया। उस समय के आन्दोलन को ठण्डा करने के लिए जो महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया गया उसमें यही मान्यवर थे। इस सन्दर्भ में यह भी महत्त्वपूर्ण है कि उस आन्दोलन को चलाने के साथ रामदेव जी द्वारा चलाये जा रहे आन्दोलन को पीछे की ओर धकेलना भी सन्देहित किया गया। उस समय आई पी एल के खेल भी शुरु होने वाले थे, उसको दृष्टिगत करते हुए आन्दोलन को जल्दी समाप्त करवा दिया गया। कई दौर की वार्ता चलने के बाद भी जब सरकार ने जनलोकपाल के लिए सहमति नहीं जताई तो मजबूरन अन्ना हजारे जी व उनकी टीम को दोबारा अनशन सहित आन्दोलन का सहारा लेना पड़ा। वर्तमान टीम में आपने देखा होगा स्वामी अग्निवेश जी कम क्या नगण्य ही दृष्टिगोचर हुए हैं। इसके संकेत पहले ही सम्भवत: टीम अन्ना को मिल गये होंगे कि यह व्यक्ति राष्ट्रिय हित के मुद~दों के लिए अनुचित है, सो उन्होंने इनको ज्यादा तवज्जो नहीं दी जिसका परिणाम, अरुन्धतिराWय व अरुणा राWय के अन्ना जी के विरुद्ध बयान आये क्या आप जानते हैं ? ये सब स्वामी अग्निवेश जी के साथ ही खड़ी दिखाई देती हैं। और अब मीडिया में भी आप ने साफ तौर पर देख लिया है कि किस प्रकार से स्वामी अग्निवेश जी ने अपने आप को टीम अन्ना अर्थात~ श्रीमती किरण बेदी जी, केजरीवाल जी, प्रशान्तभूषण जी से अपनी असहमति जताते हुए अपने आप को टीम अन्ना से अलग कर लिया है। क्योंकि इनको लग रहा है कि यह आमजन का युद्ध एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच रहा है और यदि इसमें टीम अन्ना सफल रहती है तो निश्चित ही इनको जो सुविधा सरकार की ओर से मिल रही है, वह सब जाती रहेगी इसी भय से इन्होंने टीम अन्ना का साथ छोड़ अपनी राजभक्ति को ही प्रदर्शित किया है। इस देश को ईसाई बनाने पर आमादा सोनिया जी का क्यों नहीं साथ छोड़ देते। सन्यासी का चोला धारण करने के बाद आपको क्यों आवश्यकता है राजाश्रय कि ? आज जब देश कोे इनकी आवश्यकता है तो अपने आप को इस नवजागरण युद्ध से अलग कर रहे हैं। क्या रामदेव जी को अन्ना के पास न फटकने देने की इनकी ही नीति नहीं हो सकती ? पर वास्तविकता यही है कि जब-जब देश को इनकी आवश्यकता रही है ये इसी प्रकार से अलग होते रहे हैं। आर्यसमाज व देश को पीछे ले जाने में इनका पूरा योगदान रहता ही रहा है यह सर्वविदित है। देश में अपसंस्कृति के ये संवाहक बनने को भी तत्पर रहे हैं यह भी आप भलीभांति जानते ही हैं। और यदि ये टीम अन्ना से अलग होकर अपने पुराने इतिहास को दोहरा रहे हैं तो, किमाश्चर्यमत: परम~।