जीवन में अनुशासन का महत्त्व
नन्दकिशोर आर्य
गुरुकुल कुरुक्षेत्र
इस परिवर्तनशील संसार में जीव-आत्मा के लिए दो प्रकार की योनियां मानी जाती हैं एक कर्म व दूसरी भोग योनी। संसार के सभी प्राणियों में यदि कर्म करने की स्वतन्त्रता किसी के पास है तो वह मात्र मनुष्य देह में विद्यमान आत्मा के पास है। बाकी सब प्राणी नियती द्वारा निश्चित किये गये कर्म करते हुये अपने जीवन का निर्वाह करते हैं। जो मानव जीवन हमें वर्तमान में मिला है उसको हम सार्थक कैसे कर सकते हैं ? यह विचारणीय विषय है। मानव को कर्म करने की स्वतन्त्रता तो है लेकिन फल प्राप्ति में कहीं-कहीं परतन्त्रता भी है। वे कर्म जिनको करने से व्यक्ति के जीवन का सर्वांगीण विकास होता है, उसे अपनाकर ही वह महान् बनने के स्वप्न ही नहीं देख सकता, अपितु उन्हें साकार रूप भी प्रदान कर सकता है। प्रश्न उठता है कि आखिर उन स्वप्नों को साकार कैसे किया जाए ? इन सभी प्रश्नों का मात्र एक ही शब्द में उत्तर हो सकता है ‘अनुशासन’
अनुशासन संस्कृत का वह अनुपम शब्द है जिसके माध्यम से आचार्य अपने छात्र को शिष्य के रूप में धारण करता है। आचार्य द्वारा अनुशिष्ट छात्र निश्चित रूप से उत्तम अनुशासित मानव बनता है। अनु उपसर्ग पूर्वक शास् धातु व ल्युट प्रत्यय के योग से बने इस शब्द का अभिप्राय है नियम के अनुकूल आचरण करना। वे नियम क्या हैं ? उनका निर्धारण कौन करेगा ? निर्धारकों द्वारा निर्धारित नियमों को कसौटि पर कौन कसेगा ? वे स्रोत कौन से हैं जिनसे हम सही नियमों को जान सकते हैं ? श्रुति स्मृति सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः एतच्चतुर्विधं प्राहः साक्षात् धर्मस्य लक्षणम्।। वेद, स्मृति, उपनिषद्, गीता आदि ग्रन्थ, श्रेष्ठ लोगों का आचारण व अपने द्वारा किये गये प्रिय कार्य ये सभी कर्त्तव्य के साक्षात् लक्षण हैं। आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् अर्थात् जिस कार्य को मैं अपने लिए प्रिय नहीं मानता उनको दूसरों के लिए भी न किया जाये यही श्रेष्ठाचार है। परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्। परोपकार पुण्य के लिए व दूसरों को पीड़ा देना पाप की कोटि में आता है। महान् विचारक महर्षि दयानन्द जी ने सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है कि जिन कार्यों के करने में शंका, लज्जा व भय की उत्पत्ति हो ऐसे कार्यों के करने से बचना चाहिए व जिन कार्यों के करने में उत्साह, आनन्द व निर्भयता उत्पन्न होवे ऐसे कार्यों को करना उत्तम है। महान् वैज्ञानिकों ने अपने अनुसन्धान में पाया है कि यह सृष्टि नियम पूर्वक अपने कार्यों को पूर्ण कर रही है। सूर्य का समय पर उदय व अस्त होना, शुक्ल व कृष्ण पक्ष में चन्द्रमा की कलाओं का बढ़ना, घटना, पृथ्वी सहित असंख्य तारागण अपने नियमानुकूल भ्रमण करते हुए अपने कार्य को अंजाम दे रहें हैं। इन जड़ देवताओं से हम अपने जीवन को उन्नत बनाने के लिए अनुशासन का पाठ सीख सकते हैं। वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक व राष्ट्रीय दृष्टि से हम अनुशासन को व्याख्यायित कर सकते हैं।
वैयक्तिक अनुशासन सभी कष्टों से बचने का अचूक प्रयोग है, किसी भी सामूहिकता की शुरुआत एक इकाई से प्रारम्भ होती है, इकाई के ठीक रहने से सामूहिक ढांचा भी ठीक रहता है। वैयक्तिक अनुशासन में मानसिक, वाचिक व शारीरिक को लिया जा सकता है। मानव जितने भी बाह्य कार्य करता है उसकी पृष्ठभूमि पहले वैचारिक रूप से मन में उद्भूत होती है, इसलिये सभी विचारक व्यक्ति को मन, वचन व कर्म से एक रूप होने का निर्देश करते हैं। यदि मन में उठाये गये विचारों के अनुसार कथनी नहीं है और कहे गये के अनुसार कर्म नहीं है तो निश्चय ही यह मानसिक अनुशासनहीनता कहलायेगी। यह मानसिक असन्तुलन व्यक्ति को तनावग्रस्त व अवसाद का शिकार बना डालते हैं। अतः मनसा, वाचा, कर्मणा एक होने के लिए यत्नशील होना चाहिए। वे विचार जो हमारी प्रगति में बाधक हैं उन विचारों को रोकने का प्रयत्न किया जाना चाहिए। इसके लिए सर्वप्रथम अपने आत्मस्वरूप व मन को दो भिन्न वस्तु के रूप में जानना व मानना आवश्यक है। जब तक इन दोनों की भिन्नता को नहीं जानेंगे व मानेंगे तब तक हम विचारों पर नियन्त्रण करने में अक्षम रहेंगे। किसी भी प्रकार के विचारों को मैं आत्मा ही उठाता हूं, मन तो मेरे वश में है मैं चाहूं तो आवश्यक विचारों को ही उठाऊँगा व अनावश्यक, हानिकारक व तनाव व अवसाद उत्पन्न करने वाले विचारों को रोक देने में समर्थ रहूंगा तो निश्चय जानिये की निरन्तर अभ्यास से हम इस मानसिक अनुशासन की स्थिति को प्राप्त कर लेंगे। मानसिक अनुशासन में सिद्ध व्यक्ति अपने आन्तरिक द्वन्द्वों को देख व रोक पाने में समर्थ हो जाता है। महाभारत के युद्ध से पूर्व श्रीकृष्ण-अर्जुन के संवाद में अर्जुन द्वारा पूछे गये मन की चंचलता व इसको रोकने के उपाय के रूप में श्रीकृष्ण जी ने इस मानसिक असन्तुलन को सन्तुलित करने के दो उपाय बताये हैं, अभ्यास और वैराग्य। ‘योग दर्शन के अनुसार ‘तत्रस्थितौ यत्नोभ्यासः’ अर्थात् जिस विचार से हम बचना चाहते हैं उसे विवेक पूर्वक रोकने लिए बार-बार पुनरावृत्ति करें जिससे वह हमारा स्वभाव बन जाए, साथ ही ‘दृष्टानुश्रविक विषयवितृष्णस्य वशीकार संज्ञा वैराग्यम्’ देखे और सुने गये विषय-वासनाओं से अपने आप को रोकना वैराग्य है। इन दोनों से मानसिक स्वास्थ्य ठीक रहेगा व कार्यों के करने में हमारी क्षमता का विकास होगा।
वाचिक अनुशासन जीवन को अनुशासित करने की कारगर औषधी है। किसी शस्त्र से किया गया घाव समय के अनुसार भर सकता है, लेकिन वाणी द्वारा किया गया घाव कभी नहीं भरता। वाणी के दुष्ट प्रयोग से हुए बहुत सारे ऐतिहासिक युद्ध प्रकरणों को इतिहास ग्रन्थों में पढ़ा व जाना जा सकता है। किसी कवि का कथन भी है ‘‘बोल का मोल अमोल है, बोल सके तो बोल। पहले भीतर तोल कर फिर मुख बाहर खोल’’ अनावश्यक व अधिक बोलने से शरीर की ऊर्जा का व्यर्थ में व्यय होता है। आवश्यकता होने पर ही बोलना व अपनी वाणी पर पूर्ण नियन्त्रण रखना वाचिक अनुशासन कहलाता है। वेद में लिखा हैः- वाचा वदामि मधुमत्- वाणी से मधुर ही बोलें। वाणी का प्रयोग इस प्रकार से किया जाये की वह हृदय में घाव नहीं अपितु सोहार्दता को उत्पन्न करने वाली हो। अनुशासित व संस्कारित वाणी मानव-जीवन को उन्नत करने का श्रेष्ठ सोपान है। नीतिकार भर्तृहरि ने लिखा है ‘वाण्येका संमलंकरोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते’ अर्थात् संस्कारित वाणी का प्रयोग व्यक्ति के आभूषण के रूप में समझी जा सकती है।
शारीरिक अनुशासन हमारी बाह्य इन्द्रियों के नियन्त्रण व रोग-निवारण से सम्बन्ध रखता है। अधिकांश रोगों को हम अपनी शरीर के प्रति की गई अनवधानता के कारण आमन्त्रित करते हैं। आहार, निद्रा व ब्रह्मचर्य स्वस्थ रहने के तीन आधार स्तम्भ माने गये हैं इन तीनों के सन्तुलन व अनुशासन से हम अपने शरीर को दीर्घकाल तक नीरोग रख सकते हैं। वर्तमान में बहुत सारी खोजों से यह पाया गया है कि हम इस प्रकार के आहारों का सेवन कर रहें हैं जो हमारे शरीर को विभिन्न रोगों से ग्रस्त कर रहा है, वैद्यक शास्त्र के नियम अनुसार लिया गया खाद्य निश्चय ही हमारे शरीर को रोगग्रस्त होने से बचायेगा। नित्यप्रति योग-प्राणायाम, प्रातः भ्रमण व उचित व्यायाम से इन्द्रियां सबल रहेंगी जिससे शारीरिक तन्त्र भली-भांति क्रियाशील रहेगा। सुश्रुत-संहिता में शारीरिक स्वास्थ्य के लिए ‘प्रातःकाले व्यायामः नित्यं दन्तविशोधनं’ लिखकर व्यायाम की महत्ता को प्रदर्शित किया है। शरीर को शुद्ध रखने के लिए तीसरा आधार ब्रह्मचर्य बतलाया है- अर्थात् भोगों का सन्तुलित उपभोग ‘अति सर्वत्र वर्जयेत्’ किसी भी भोग का अतिसेवन निश्चय ही शारीरिक सन्तुलन को बिगाड़ सकता है। अतः शारीरिक अनुशासन से हम अपने शरीर को स्वस्थ व दीर्घायुष्य कर सकते हैं।
पारिवारिक अनुशासन से अभिप्राय है परिवार में रह रहे सभी परिजनों का यथायोग्य सत्कार करना। प्रायः एकाकी रहने की हमारी मजबूरियां भारतीय संयुक्त परिवार की परम्परा को नष्टप्रायः कर रही हैं। छोटा परिवार भी सुख का आधार तभी बन पायेगा जब उसमें एक दूसरे के हितों का ध्यान रखा जाये। परस्पर सहयोग की भावना से एक दूसरे को बढ़ाते हुए चलने से हमारा पारिवारिक आधार दृढ़ होगा। वेद मंे पारिवारिक अनुशासन बनाने के लिए बहुत सुन्दर वर्णन मिलता है ‘मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन् मा स्वसारमुत स्वसा’ भाई-भाई से व बहन-बहन से द्वेष न करे क्योंकि द्वेष की अग्नि व्यक्ति को आन्तरिक रूप से कमजोर करती है, वेद में पिता-पुत्र, माता-पुत्र व पति-पत्नी को अनुशासित रहने के लिए इस प्रकार का निर्देश दिया हैः- ‘अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रा भवतु संमना। जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शांतिवाम्।। अर्थात् पुत्र पिता की आज्ञाओं का अनुव्रती व माता के साथ समान मनवाला होवे। पति-पत्नी परस्पर शान्ति प्रदान करने वाले वचनों का उच्चारण करें। इस प्रकार के गृह का अनुशासन एक दूसरे पर आश्रित है। जिस प्रकार से सामूहिक क्रीड़ाओं के खिलाड़ी परस्पर एक-दूसरे के सहयोग व पूर्ण समर्पण-भाव से विजय प्राप्त करते हैं उसी प्रकार से परिवार के संयुक्त अनुशासन से प्रसन्नता-पूर्वक जीवन की सफलता को प्राप्त किया जा सकता है। घर बालक को अनुशासन सिखाने की प्रथम पाठशाला है, घर में माता-पिता द्वारा दिये गये संस्कारों व दूसरों के प्रति सिखाये गये व्यवहारों को बालक आचरण में लाता है। वे सभी बातें आजीवन उसके साथ छाया की भांति साथ रहती है, जो भी उसने घर में सीखा है। बालक के अधिकांशतः सभी व्यवहार उसके माता-पिता व गृहजनों द्वारा किये जा रहे व्यवहारों की प्रतिछाया हैं। अतः गृहजनों के द्वारा सावधानी पूर्वक सभी व्यवहार किये जाने चाहिए, तभी वे एक अनुशासित व श्रेष्ठ नागरिक बनाने की ओर अग्रसर हो सकेंगे।
समाज के प्रति अनुशासित होना हमें सामाजिक रूप से मजबूत करता है, आपसी सौहार्द व पारस्परिक सहयोग की भावना, जाति व सम्प्रदायगत विचारों की अपेक्षा मानवीय मूल्यों से युक्त होना, सामाजिक सकारात्मक सांस्कारिक-मूल्यों में आस्था व उनका पालन करना सामाजिक उन्नति में सहयोगी सिद्ध होंगे।
राष्ट्रीय-अनुशासन से अभिप्राय है राष्ट्र के प्रति प्रति-बद्धता। अनुशासन राष्ट्रीय जीवन में प्राण स्वरूप है। अनुशासनहीन राष्ट्र सेना-विहीन राष्ट्र की तरह होता है। युवाओं की दृष्टि से भारत सभी राष्ट्रों में अग्रणी माना जाता है, अतः युवाओं को और ज्यादा तत्पराता व सावधानी से इस देश को आगे बढ़ाने में पूर्ण सहयोग करना चाहिए। आये दिन बहुत से ऐसे व्यवहार देखने में आते हैं जिनसे देश की सार्वजनिक सम्पत्ति को हमारे लोगों द्वारा ही हानि पहुंचायी जाती है। ये राष्ट्र की हानि नहीं अपितु हमारी स्वयं की हानि है। हम अपनी सभी आवश्यकतायें इसके माध्यम से ही तो पूर्ण करते हैं। हमारे संविधान निर्माताओं ने जो हमारे मूल कर्त्तव्य व मूल-अधिकार प्रदान किये हैं उसी सीमा में रहकर उनका पालन हमारा परम कर्त्तव्य होना चाहिए तभी हम राष्ट्र के प्रति अनुशासित रह पायेंगे। हम सबके परिश्रम व धन की बदौलत यह राष्ट्र नित्यप्रति नये सोपानों को गढ़ रहा है इसको और अधिक समृद्ध व सुदृढ़ बनाने में हम क्या सहयोग कर सकते हैं इस पर चिन्तन होना चाहिए। पर्यावरण-रक्षा के प्रति सजगता, जल को बचाने के उपाय, संसाधनों का उचित प्रयोग ये सभी कार्य हम अनुशासित रहकर ही कर सकते हैं।
विद्यार्थी जो आधार है राष्ट्र का, भावी जीवन की उन्नति का लेख इसी जीवन-काल में लिखा जाता है। चार आश्रमों में ब्रह्मचर्य आश्रम को प्रथम व महत्त्वपूर्ण माना जाता है। आचार्य छात्र को अनुशिष्ट करने के लिए अपने हृदय में उसको धारण करता है, नई पीढ़ी जो जागरुक है अपने अधिकारों के प्रति उसे अधिकारों के साथ ही कर्त्तव्यों के निर्वहन के लिए तैयार होना चाहिए। अच्छी शिक्षा विद्यार्थी में अनुशासन का संचार करती है। विद्याथिर्यों को अपने सहपाठियों, अध्यापकों, विद्यालय के प्रति सहज अनुशासित होना चाहिए। अनुशासन में रहकर छात्र अपने आचार्य व विद्यालयीय वातावरण से अधिकतम ग्रहण कर सकता है। ‘सुखार्थिनः कुतो विद्या, नास्ति विद्यार्थिनः सुखम्’ विद्यार्थी-काल सुख के लिए नहीं अपितु शिक्षा प्राप्ति में आने वाले कष्टों को सहन करते हुए शिक्षा ग्रहण करना चाहिए क्योंकि सुख चाहने वाले को शिक्षा नहीं आती व विद्या चाहने वाले को प्रारम्भिक कष्टों को तो सहन करना ही होगा। विद्यार्थियों को अधिकतम ज्ञान प्राप्ति के लिए समय-प्रबन्धन अर्थात् आदर्श दिनचर्या बनाकर उसकी अनुपालना करनी चाहिए जो कम समय में अधिक उपलब्धि प्राप्त करने में सहायक सिद्ध होगी। प्रातः जागरण, बड़ों को अभिवादन, स्वच्छता, व्यायाम, योग-प्राणायाम, ध्यान, पौष्टिक आहार, विद्यालय में सजग होकर पाठ श्रवण व गृहकार्य समय पर पूर्ण करना आदि अपनी दिनचर्या को समय के अनुसार बनाकर अनुशासित जीवन से अपने को श्रेष्ठ बनाने में सफल हो पायेंगे। सकारात्मक-चिन्तन ‘यदि मैं चाहूं तो विश्व को कोई शक्ति मुझे आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती, और मैं न चाहूं तो विश्व की कोई शक्ति मुझे आगे नहीं बढ़ा सकती। सकारात्मक चिन्तन जीवन को अनुशासित करने में अत्यन्त सहायक सिद्ध होगा।
अतः हम कह सकते हैं कि अनुशासन सामाजिक सन्तुलन को बनाये रखने के लिए अत्यावश्यक कारक है। अनुशासन के बिना श्रेष्ठ समाज की कल्पना ही नहीं की जा सकती, वर्तमान की बढ़ती हुई प्रतिस्पर्धात्मक जीवन शैली में अनुशासित व्यक्ति सफलता को शीघ्रता से प्राप्त कर सकता है। अनुशासन विकासपथ है, जिस पर चलकर सम्भावित उद्देश्यों को पूर्ण किया जा सकता है। अनुशासन हमारे द्वारा निर्धारित लक्ष्यों व उसकी उपलब्धि के बीच में सेतु का कार्य करता है। यह अनुशासन रूपी सेतु जितना दृढ़ होगा उतनी ही शीघ्रता से हम अपने लक्ष्यों को पा सकते हैं। अनुशासन को व्यक्ति, परिवार, समाज व राष्ट्र की नींव कहा जा सकता है। अनुशासन संस्कृति का मेरुदण्ड है। किसी भी देश की सांस्कृतिक व सांस्कारिक परम्परा को वहां के युवाओं द्वारा किये जा रहे व्यवहारों व क्रियाकलापों से जाना जा सकता है। फूलों का खिलना, फलों का पकना, वर्षा का आना भी प्राकृतिक अनुशासन के ही दायरे में आता है अगर मनुष्य इस प्रकृति का अनुगामी बनकर अनुशासन का पालन करता है तो वास्तव में वह ईश्वर की श्रेष्ठ कृति कहलाने का हकदार है।

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