सोमवार, 12 सितंबर 2011

रामदेव बप्पा मोरिया

रामदेव बप्पा मोरिया


भाद्रपद चतुर्दशी को गणेश मूर्तियों का विसर्जन किया गया। इस दिन आस्था चैनल पर सीधा प्रसारण दिखाया जा रहा था। जो समय स्वामी रामदेव जी के उद्बोधन का होता है, ठीक उसी समय ये प्रसारण किया जा रहा था। स्वामी रामदेव जी अपने को वेदभक्त कहते हैं तो क्या यजुर्वेद का यह मन्त्र स्मरण नहीं है ? ‘‘न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः’’ परमात्मा स्वयं कहते हैं कि मेरी कोई प्रतिमा नहीं है, तो फिर ये कैसी वेदभक्ति है ? ये तो सरासर घपला है। महर्षि स्वामी दयानन्द जी महाराज को अपना आदर्श मानने वाले का क्या ये कथन हो सकता है कि भगवान् गणेश कष्टमोचक हैं ? जब आपके आदर्श तथाकथित भगवान् महावीर व बुद्ध होंगे तो निश्चित रूप से आप नास्तिकता की बात करेंगे क्योंकि नास्तिकता को प्रसारित करने वाले यही दो महानुभाव थे। यदि आप विवेकानन्द जी को अपना आदर्श मानोगे तो मूर्तिपूजा व अन्य वे कार्य भी करने को प्रेरित होंगे जो उनकी मान्यता है। यदि आप कावड़ियों स्वागत इसिलिये करोगे की ये शिवभक्त हैं तो आप विजया के सेवन का विरोध कैसे करेंगे ? स्वामी दयानन्द जी ने भारत के पतन के प्रमुख कारणों में मूर्तिपूजा को स्वीकार किया है। यदि इसका विरोध नहीं कर सकते तो कम से कम पक्ष तो मत लो यदि आप इसका विरोध करेंगे तो आप कह सकते हैं कि वेद में ऐसा कहीं नहीं लिखा है। और आपको तो सभी मतावलम्बी आर्यसमाजी ही मानते हैं, फिर किस बात का डर है। वेद के साथ घालमेल मत कीजिए।

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